शब्दों में संवेदनाएं, कविताओं में जीवन की सच्चाइयाँ।
फिर कब आओगे बसंत ?
पीली सरसों अब फली बनी
बौर गये आम लग गये ,
अबीर गुलाल होली में बरसे ,
गर्मी ने दस्तक दे दी।
फगुआ की धूम मची फूले पलाश महका दिगंत,
जो आता है जाना है निश्चित,
तुम बिन क्यूँ मन हो रहा विक्षिप्त ,
तुम बिन नीरस लगती है प्रकृति।
पक्षी का होता है कलरव मौन विस्मय,
तुम आते हो और जाते हो
नवचेतन नव वर्ष का संदेशा दे जाते हो ,
तुम केवल ऋतु नही तुमसे नवचेतन का स्पंदन।
तुम्हे देख मानव मन में जागे है सत्य स्वप्न ,
फिर से स्वागत करने को
तैयार है जड़ चेतन अनंत ,
तेरे जाने से पहले परदेश गये मेरे कंत।
तुम फिर कब आओगे बसंत ?
–सुशीला तिवारी , पश्चिम गांव, रायबरेली
देश प्रेम
हमारा भारत है महान ,
हमारा भारत है महान।
गंगा ,यमुना और हिमालय
इसकी है पहचान।
अलग अलग है जाति धर्म
पर सबकी यही है एक
राष्ट्रहित की बात।
जो आई हम सब बनते एक
राष्ट्र हित के लिए लुटाते हैं
हम सब प्राण।
गंगा यमुना और हिमालय
इसकी है पहचान।
मेरे पड़ोसी गैर से मांगे आयुध
पर इतराते हैं,
लेकिन अपनी पूर्व की करनी पर
अबतक शरमाते हैं।
हम सब भारत वासी का
प्यारा हिंदुस्तान।
गंगा यमुना और हिमालय
इसकी है पहचान।
हम तो अहिंसा के पथ गामी
या समझो तुम पुजारी,
लेकिन जब ज़िद पर आजाएं
पड़ते वीरो पर भारी।
देश के दुश्मन अपने मन में
न करना अनुमान।
गंगा यमुना और हिमालय
इसकी है पहचान।
–शबनम मेहरोत्रा, कानपुर
घनाक्षरी
(01) अंजाना सफर
अंजाना सफर नहीं अंजानी डगर नहीं।
मंजिल को याद रख ,पहुंच ही जाएगा।।
साथी साथ हो सुंदर, हृदय हो समन्दर।
आनंद की बरसात, साथी ही कराएगा।।
राह में जो बाधा आएं, प्रेम से उसे हटाएं।
अंजाने सफर को भी, सुहाना बनाएगा।।
(02)
चाहतों की सीमा नहीं, सफर भी धीमा नहीं।
जीवन में जो भी पाया, वही तो अकूत है।।
संचय नहीं जरूरी, मत मांगों साग पूरी।
वह भी मिले तरुण , घर में सपूत है।।
छोड़ बुरी आदतों को, भूल ठेके के पतों को।
सोच मत छुटे नहीं , यह नहीं भूत हैं।।
-पंकज शर्मा “तरुण” मंदसौर
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