“जिंदगी वही बदलती है, जो खुद को बदलने का साहस रखती है।”
सुशी सक्सेना, इंदौर (मध्यप्रदेश)
… लेकिन उसकी बातों का मुझ पर कोई असर नहीं हुआ क्योंकि उस समय मैं एक आदर्श
पत्नी और एक अच्छी बहू बनने के प्रयास में लगी थी। इसलिए उसकी बातों पर मैंने ज्यादा
ध्यान ही नहीं दिया।क्या मालूम था कि हर संभव प्रयास के बाद भी असफल हो जांऊगी
क्योंकि इस दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो कभी संतुष्ट भी नहीं होते। अच्छे से अच्छे
कामों में से भी कमियां निकालना ही उनकी आदत में होता है। अगले दिन वो वापिस चली
गई। इतने साल गुजर गए। उससे दुबारा मिलना तो नसीब नहीं हुआ पर हम आज भी फोन,
WhatsApp और FB से जुड़े हैं। वो मेरी सबसे अच्छी दोस्त बन गयी है। लेकिन मुझे आज
अहसास हो रहा है कि तब से ही मैं उसकी बातों पर अमल करती तो शायद इतनी दुखी न
होती। आज मेरी जिंदगी को नया मोड़ मिल चुका होता और मेरी जिंदगी की परिभाषा एक
बार पुनः बदल जाती।
देर से ही सही पर उसकी इस बात ने मुझे सोचने के लिए एक नई राह दी है और जीवन को
नया मोड़ साथ ही जिंदगी की परिभाषा को बदलने के लिए नये शब्द।
मैंने फैसला कर लिया, मैं खुद को रिअरेंज करूंगी। मैंने स्वीकार लिया कि एक पत्नी के
तौर पर मुझे अपने पति से जो भी अपेक्षाएं हैं वो उसे पूरी नहीं कर पायेंगे। तो उस पर दुखी
होने का क्या मतलब। उन्हें न कभी बदल पायी और शायद न कभी आगे बदल पाऊंगी। तो
फिर उस पर दुखी हो कर क्या बदल पाऊंगी बल्कि खुद को ही नुकसान पहुंचाऊंगी। इससे
पहले कि मेरी जिंदगी में पूर्ण विराम लग जाये, मैंने उस पर विचार करना बंद कर दिया। और
अपने शौक की तरफ ध्यान देना शुरू किया। लिखने का शौक तो मुझे बचपन से ही था। छोटी
छोटी कहानियां और कविताएं लिखकर जब परिवार वालों को सुनाती, जो तारीफ सुनने को
मिलती तो ऐसा लगता था कि जैसे जीवन की सबसे बड़ी खुशी मिल गई हो। शादी के पहले
तक मेरा लेखन कार्य जारी था। शायद दिल के किसी कोने में जीवन के इस स्वपन को छुपा
कर रखा था कि मैं कभी लेखिका बनूं।
पर शादी के बाद तो जैसे सब बदल ही गया। घर के काम और ससुराल वालों की सेवा से
कभी खुद के बारे में सोचने की फुर्सत ही न मिली। उन्हें भी एक नई मुफ्त की नौकरानी मिल
गई थी। मैं भी अपना फर्ज समझ कर सबको खुश करने में लगी थी। पर उनकी शिकायतें
कभी खत्म नहीं हुई, पर मेरा प्रयास जारी था। इसके बावजूद भी लेखन का सिलसिला कभी
खत्म ही न हुआ था। मैं भले ही घर के कामों में व्यस्त रहती परंतु मेरे दिल और दिमाग में
सोचने की प्रक्रिया निरंतर जारी रहती और मुझे लेखन की तरफ खींचती रहती।
पर शायद अब वक्त आ गया है दिल में छुपी इस चिंगारी को हवा देने का। इसलिए अपने
पति समीर की उपेक्षा को दर किनार कर के मैंने अपने लेखन पर विचार करना शुरू कर
दिया। अपनी लिखी कुछ रचनाएं न्यूज पेपर व मैगजीन में भेजी। जिसमें से एक दो छपी तो
मुझे लगा कि मेरे जीवन को एक नई दिशा मिल गई हो।
जीवन में लक्ष्य कितना मायने रखता है इस बात का भी अहसास हो गया और मैंने लेखन
को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। अपना पूरा ध्यान इसी काम में लगा दिया। अब
व्यवस्तता में आंसू बहाने का वक्त ही नहीं मिलता था। हालांकि मेरे पति समीर के स्वभाव
में कोई भी फर्क नहीं आया है, फिर भी मैंने खुद को खुश रखने का रास्ता ढूंढ लिया और सिर्फ
ये हो पाया शाहीन की वजह से।
जब मेरी जिंदगी में पूर्ण विराम लगने वाला था और मैं खत्म होने की कगार पर थी तब
शाहीन मेरी जिंदगी में आई और मुझे जीवन की एक नई परिभाषा सिखा गई। जिसका एक
एक शब्द नयी ऊर्जा, उत्साह और आशाओं से परिपूर्ण था।
जिस प्रकार मेरी दोस्त श्रुति ने अपनी जिंदगी की परिभाषा को बदल कर रख दिया, उसी
तरह यदि हम चाहें तो हमारी जिंदगी की परिभाषा को बदल सकते हैं, और खुश रहने का
रास्ता ढूंढ सकते हैं।
(काल्पनिक रचना)
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