“जिंदगी वही बदलती है, जो खुद को बदलने का साहस रखती है।”
सुशी सक्सेना, इंदौर (मध्यप्रदेश)
हर किसी की कोई न कोई परिभाषा अवश्य होती है। बिना परिभाषा के कोई भी चीज पूर्ण
नहीं होती, फिर चाहे वह कोई बस्तू, नियम कानून, विज्ञान, समय हो या फिर खुद हमारी
जिंदगी ही क्यों न हो। बिना परिभाषा के तो हमारी जिंदगी के भी कोई मायने नहीं होते।
हम हमारी जिंदगी में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिन्हें कभी नहीं सुधारा जा
सकता, लेकिन पछताने के अलावा बहुत कुछ किया जा सकता है। यदि हम चाहें तो हमारी
जिंदगी को एक नई दिशा दे
सकते हैं।हम हमारी जिंदगी की एक नई परिभाषा लिख सकते हैं, पर सबसे ज्यादा
महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारी खुद की जिंदगी की परिभाषा लिखने के लिए हमें शब्दों का
चयन भी खुद करना होगा।
मेरी दोस्त श्रुति हर समय खुश दिखाई देती है। आत्मविश्वास से भरी उसकी जिंदगी की
परिभाषा में जैसे निराशा, उदासी और असंतुष्टि जैसे शब्द ही नहीं थे जबकि उसके पति
समीर एक घमण्डी और जिद्दी इंसान है। दोनों के विचारों में जमीन आसमान का फर्क है,
इसके बावजूद भी हर समय प्रसन्नचित रहने वाली श्रुति को देख कर मुझसे रहा न गया और
मैंने उसकी खुशी का राज पूछ ही लिया तो उसने अपनी कहानी मुझे कुछ इस तरह से सुनाई।
आपने, हमने बल्कि सभी ने कहीं न कहीं ये तो पढ़ा ही होगा कि दुनिया के रास्तों में कांटे
बहुत बिखरे पड़े हैं। जब आप विचार करेंगे तो आप के सामने दो विकल्प होंगे। या तो आप
चप्पल पहन कर निकलेंगे, या फिर रास्तों पर बिखरे हुए कांटे को समेटते हुए जाएंगे। पहला
विकल्प ज्यादा आसान है। रास्तों में पड़े सारे कांटों को समेटते हुए जाएंगे तो पूरी की पूरी
जिंदगी ही कांटे समेटने में गुजर जायेगी। इसलिए समझदारी इसी में है कि चप्पल पहन कर
निकलेंगे।
ये समझ मुझे मेरी दोस्त शाहीन ने दी थी, जब मेरी शादी को सिर्फ तीन साल ही हुए थे।
लेकिन उसकी बातें मेरे पल्ले न पड़ी क्योंकि उस समय मैं एक आदर्श बहु और अच्छी पत्नी
बनने के प्रयास में लगी हुई थी मगर निष्कर्ष कुछ न निकला, और शाहीन की बातों को
नजरंदाज करके सिर्फ पछतावा ही हाथ लगा। क्योंकि उस समय मैं ये नहीं जानती थी कि
दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं कि जिन के लिए जान भी निकाल कर रख दें तो कोई बड़ी
बात नहीं।
आज भी जब कभी शाहीन का WhatsApp पर मैसेज आता है तो अक्सर वही बात दोहराती
है।
“लाईलाज लोगों के बारे में सोच कर खुद को दुखी मत करो। इसमें फायदा कुछ नहीं बस
नुकसान तुम्हारा ही होगा।”
यही बात उसने तब भी कहीं थी जब मेरी शादी को सिर्फ तीन साल ही हुए थे। शादी के कुछ
महीनों के बाद से ही मैं बहुत गुमसुम, चुप और खोई-खोई सी रहने लगी थी। अपने पति
समीर की अशिष्टता के बारे में सोच सोच कर बस हर दिन कुढ़ती ही रहती थी। घर में पड़े
पड़े आंसू बहाया करती थी और इस जीवन को अपना नसीब मान कर स्वीकार चुकी थी।
लगातार द्वंद में रहा करती, जबकि मूलता मेरा स्वभाव पहले ऐसा नहीं था। कालेज के दिनों
में मैं अपने दोस्तों में हंसमुख और मिलनसार मानी जाती थी। चुलबुली, हरदम हंसती
मुस्कुराती रहने और खुले विचारों वाली वो लड़की जो जिंदगी की हर खुशी को अपने दामन में
समेटना चाहती थी। उसकी जिंदगी की परिभाषा में तो जैसे निराशा जैसे शब्द ही नहीं थे।
शादी के बाद मैं निराशा और उदासी के इस कदर अर्द्धविक्षिप्तता की हालत में पहुंच गई
घर का हर काम करती तो थी लेकिन कहीं मन लगता नहीं था। कभी न घर अपना लगा
और न कभी इस घर के लोग, और न कभी ये अहसास भी हुआ कि इस घर में मेरे होने का
कोई मतलब है। एक गृहस्वामिनी और किसी की पत्नी होने जैसा गर्व मैंने कभी महसूस ही
नहीं किया। मेरे जीवन की तो जैसे पूरी की पूरी परिभाषा ही बदल गयी थी। मन की उस
अवस्था ने मुझे बीमार कर दिया था। बस यूं ही बेमानी जिंदगी जैसे तैसे किसी सजा की तरह
कटी जा रही थी।
शादी की ठीक तीसरी सालगिरह पर जब अचानक शाहीन से मुलाकात हुई तो बहुत
अच्छा लगा। शाहीन मेरी कालेज के जमाने की दोस्त थी। बहुत पक्की तो नहीं पर हां
क्लासमेट होने के कारण रोज ही मिलना होता था। वो इंदौर घूमने अपने परिवार के साथ
आई थी।
जिंदगी से लबरेज और हर वक्त खुश रहने वाली शाहीन सकारात्मक विचारों से परिपूर्ण
थी। उसकी खासियत उसकी संवेदनशीलता थी। उसकी जिंदगी की परिभाषा के तो जैसे शब्द
ही अद्भुत थे। उसी की वजह से उसने मेरे दुःख के स्रोत को ढूंढ लिया था। अलग धर्म की होते
हुए भी और रहन सहन और संस्कार सबसे परे शाहीन कब दिल के करीब आ गई पता ही न
चला। जान पहचान तो पहले से ही थी बस इतने सालों बाद किसी से अपनापन पा कर मुझे
भी बहुत अच्छा लगा। धीरे धीरे जब मैं उसके सामने खुली तो दिल के हर राज को खोल दिया
और खुद को हल्का महसूस करने लगी।
वो दिन मेरे लिए सबसे खास था। मेरे पति समीर अपने आफिस के काम से बाहर गए हुए
थे। मेरे आग्रह पर वो मेरे घर आ गई। शायद वो भी बहुत सारी बातें मुझसे करने का मौका
तलाश रही थी।हम दोनों ने सारा दिन साथ गुजारा । बहुत सारी बातें उसने अपने बारे में भी
बतायी । मेरे हालात की जानकारी तो उसे पहले से ही थी। सब कुछ जानने के बाद बातों बातों
में उसने मुझसे कहा।
“लाईलाज लोगों के बारे में सोच सोच कर अपनी ऊर्जा नष्ट करने के बजाय उसका
उपयोग सकारात्मक तरीके से करो। कुढ़ कर, रो कर और भूखे रहकर खुद को सजा देना बंद
करो। ये जीवन बहुत अनमोल होता है। इसे बर्बाद मत करो। एक लक्ष्य बनाकर उसे पूरा करने में लगा दो इस जीवन को।”
क्रमश:
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