जब बच्चों को अपने सपने खुद चुनने दिए जाएँ, तभी उनके पंख सच में खुलते हैं।
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
दिल्ली के रोहिणी इलाके में शाम का वक्त था। गलियों में समोसे और चाय की खुशबू फैली हुई थी। वर्मा परिवार का छोटा-सा फ्लैट दीपक की रोशनी में जगमगा रहा था।
रमेश वर्मा—सरकारी बैंक में मैनेजर—अपनी डायरी में कुछ लिख रहे थे। उनकी पत्नी सविता किचन में खाना बना रही थीं, और उनका सोलह वर्षीय बेटा आरव कमरे में बैठा गिटार के तार छेड़ रहा था।
“आरव!” रमेश की आवाज़ गूंजी, “फिर वही गिटार? कल मैथ्स का टेस्ट है, और तुम सुरों में खोए हो!”
आरव चुपचाप गिटार नीचे रख देता है। “जी पापा, पढ़ता हूँ,” कहकर किताबें खोल लेता है।
सविता रसोई से आवाज़ देती हैं, “इतना मत डाँटिए, बच्चा है अभी।”
रमेश झल्लाकर कहते हैं, “बच्चा नहीं, क्लास टेन्थ में है। मैं चाहता हूँ कि ये डॉक्टर बने। अपने बेटे को सफेद कोट में देखना मेरा सपना है।”
आरव मन ही मन सोचता है—पापा का सपना, लेकिन मेरा क्या?
पहला मोड़: स्कूल का आमंत्रण
अगले हफ़्ते स्कूल की प्रिंसिपल ने वर्मा दंपति को बुलाया। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “आपका बेटा संगीत में बहुत प्रतिभाशाली है। हम उसे ‘इंटर-स्कूल म्यूज़िक कंपटीशन’ में भेजना चाहते हैं।”
रमेश ने ठंडे स्वर में कहा, “मैडम, गाना-बजाना तो शौक की चीज़ है। हम चाहते हैं कि वो पढ़ाई पर ध्यान दे। ये सब तो टाइम पास है।”
प्रिंसिपल ने संयत स्वर में कहा, “सर, कभी-कभी बच्चे का असली टैलेंट किताबों में नहीं, सुरों में मिलता है।”
घर लौटते हुए आरव बोला, “पापा, मुझे बस एक मौका दे दीजिए। अगर अच्छा न गाया तो खुद छोड़ दूँगा।”
रमेश ने कड़क स्वर में कहा, “बेटा, ये ज़िंदगी कोई रियलिटी शो नहीं है। असली दुनिया में गाना पेट नहीं भरता। अब बस पढ़ाई पर ध्यान दो।”
आरव का गला भर आया, पर वह कुछ न बोला।
दूसरा मोड़: असफलता और निर्णय
बारहवीं बोर्ड परीक्षा खत्म हुई। सबने उम्मीद लगाई थी कि आरव डॉक्टर बनने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाएगा। लेकिन जब मेडिकल एंट्रेंस का रिज़ल्ट आया, उसका नाम कहीं नहीं था।
रमेश गुस्से में बोले, “इतनी कोचिंग लगाई, फिर भी फेल? अब तो इंजीनियरिंग करनी पड़ेगी।”
आरव हिम्मत जुटाकर बोला, “पापा, मैं इंजीनियर नहीं बनना चाहता। मैं गाना चाहता हूँ, संगीत बनाना चाहता हूँ। जब मैं गिटार बजाता हूँ, तो खुद को ज़िंदा महसूस करता हूँ।”
रमेश की आँखें लाल हो गईं। “बस बहुत हुआ! मैंने तुम्हारे लिए इतने सपने देखे और तुम उन्हें ठुकरा रहे हो?”
क्रमश: