“मोहब्बत, माँ-बाप और मजबूरियों के बीच फंसा एक अधूरा वजूद…”
आश हम्द, पटना (बिहार)
…उस वक्त आदम इतना बेचैन था बिना सोचे समझे दो-तीन घूंट लेकर वापस जाकर बेड पर गिर गया।
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कमरे का दरवाज़ा खुला तो आदम अतीत से वर्तमान में लौट आया। शकील अंदर आ रहा था, आदम ने जल्दी से अपनी भीगी पलकों को पोंछा और आँखें मूंद ली। “ सर, सो रहे हैं क्या ?”
“ क्या हुआ ?”
“ सर, आपसे कोई मिलने आए हैं !”
“ कौन आया है ? घर से कोई आया है तो मुझे नहीं मिलना किसी से ।”
“ नहीं, घर से आपके कोई नहीं आया है। कोई ज़फ़र साहब गाँव से आए हैं ।” शकील ने विस्तृत जानकारी दी। तभी कमरे का दरवाज़ा धकेलते हुए ज़फ़र अंदर आ गए और आदम से लिपट गए।
“ चाचू, आप आ गए !” आदम उनके सीने से लगा रो पड़ा।
“ मुझे तो आना ही था। मेरा बच्चा अब बिल्कुल ठीक हो गया है तो उसे घर ले जाने मुझे आना ही था ।”
“ नहीं चाचू, मैं मुनीर सुल्तान के घर नहीं जाऊंगा !”
“ ऐसा नहीं बोलते बेटा, पापा है तुम्हारे, तुमसे बहुत प्यार करते हैं। वैसे भी अभी मैं तुम्हें वहाँ लेकर नहीं जा रहा, अभी तो हम गाँव जाएंगे, ख़ूब मस्ती करेंगे चाचा भतीजा !” गाँव जाने का सुनकर आदम बच्चों की तरह ख़ुश हो गया।
“ चलो, मेरा बेटा अब घर चलते हैं ।”
मुनीर सुल्तान गाँव आए हुए थे और ज़फ़र का हाथ थामे बैठे थे।
“ ज़फ़र, तुम मेरे भाई ही नहीं, मेरे लिए फरिश्ता हो। आज तुम्हारी वजह से मैं अपने बेटे की शक्ल देख पा रहा हूँ, उसे सही-सलामत देख पा रहा हू। वो तो हमारी शक्ल भी नहीं देखना चाहता था। अगर तुम दिल्ली जाकर उसे वापस नहीं लाते, इलाज नहीं करवाते तो अब तक पता नहीं क्या हो जाता….! कहते हुए मुनीर फफक कर रो पड़े।
“ अरे भाई साहब, आप ऐसे रोइए मत, बल्कि आदम के सेहरे के फूल सजाने की तैयारी करिए मैंने उसके लिए एक लड़की देखी है। आप राजी हैं तो आप और भाभी भी देखकर तसल्ली कर लीजिए ।” ज़फ़र ने खुशमिजाजी से कहते हुए माहौल को हल्का-फुल्का बनाने की कोशिश की। फिर जल्दी ही धूमधाम से आदम की शादी कर दी गई।
पढ़ी-लिखी, सुलझी और बहुत संस्कारी लड़की को ज़फ़र ने आदम के लिए चुना था ताकि वह उसके बिखरे वजूद को समेट सके, उसको जीना सिखा सके। और आने वाली ने आदम को संभाल भी लिया था।
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मैं आदम सुल्तान। अपने माँ-बाप का लाडला होते हुए भी कभी भी अपने मन की नहीं कर सका। और जब करने की कोशिश की तो ऊपर वाले की नज़र में गुनहगार बन गया। जिन ज़फ़र चचा को मेरे माँ-बाप ने हमेशा जाहिल गंवार कहा, उन्हीं की वजह से मैं अपने पैरों पर फिर से खड़ा हो पाया हूँ। और जब उन्होंने मुझे ख़ुदा के आगे खड़ा किया तो मैं अपनी नज़रें भी उठा ना सका। माफी मांगने के लिए जब अपने हाथों को फैलाया तब रफ्ता रफ्ता मेरे दिल में सुकून उतरने लगा था। मेरे धड़कनों के धधकते शोलों को आराम मिलने लगा।
मैरी कभी मेरे दिल से नहीं गई, ना ही कभी जा सकती है। लेकिन रिदा के मेरी ज़िंदगी में आ जाने से एक ठहराव आ गया था। उसकी मोहब्बतें, उसकी रिफ़ाकतें मुझे जीना सिखाने लगी हैं। लेकिन फिर भी सब कुछ मुकम्मल होते हुए भी कुछ अधूरा सा लगता है। यह अधूरापन इसलिए नहीं है कि मैरी मुझे नहीं मिल सकी बल्कि इसलिए है कि मैं अपनी माँ के होते हुए भी उनकी ममता महसूस नहीं कर सका। वह सख़्ती करके मुझे डॉक्टर, इंजीनियर बनना चाहती थीं लेकिन उनकी सख़्ती ने मुझे अधूरापन दे दिया, मेरे वजूद को अधूरा सा कर दिया….
“अधूरापन भी कभी-कभी एक नई शुरुआत का नाम होता है, जब इंसान सीख ले कि टूटा हुआ वजूद भी फिर से रोशनी बन सकता है।”
(काल्पनिक रचना)