“ज़िंदगी के सबसे महंगे सबक किताबों में नहीं, गलतियों की फीस देकर मिलते हैं।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
शाम का वक्त था। बरसात की हल्की बूँदें खिड़की के शीशे पर टिक-टिक कर गिर रही थीं। ड्रॉइंग रूम में बैठे शशिकांत शर्मा चुपचाप अख़बार पढ़ रहे थे, पर उनकी आँखें पन्नों पर नहीं, बल्कि सामने रखी एक पुरानी फाइल पर टिकी थीं। उसी फाइल में उनके बेटे आरव के भविष्य के सपने बंद थे।
चार साल पहले…
जब आरव सत्रह का था, तब शशिकांत जी उसे बैंक ले गए थे।
“पापा, मुझे अभी बैंक अकाउंट की क्या ज़रूरत है?”
आरव ने मासूमियत से पूछा था।
शशिकांत जी मुस्कराए थे,
“इसलिए नहीं कि तुम्हारे पास पैसा हो… बल्कि इसलिए कि तुम्हें पैसों की ज़िम्मेदारी समझ में आए।”
उस दिन आरव का पहला बैंक अकाउंट खुला था। सिग्नेचर कार्ड पर उसने झिझकते हुए हस्ताक्षर किए थे। पिता ने ध्यान से देखा था—कहीं भी जल्दबाज़ी नहीं, कोई लापरवाही नहीं।
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चार साल बीत गए।
आज आरव इक्कीस साल का हो चुका था। कॉलेज का आख़िरी साल था और फीस जमा करने की आख़िरी तारीख भी।
“आरव,”
शशिकांत जी ने गंभीर आवाज़ में कहा,
“इस बार कॉलेज की फीस तुम अपने अकाउंट से जमा करोगे।”
आरव थोड़ा घबराया,
“मैं… मैं कर लूँगा पापा।”
उसने चेकबुक निकाली। पहली बार अपने हाथों से इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी निभाने जा रहा था। उसने रकम भरी, चेक काटा और जल्दी-जल्दी साइन कर दिए। मन में बस एक ही बात थी—सब ठीक हो जाए।
कॉलेज के काउंटर पर क्लर्क ने चेक ले लिया। लेकिन आरव के सिगनेचर मिसमैच होने की वजह से बैंक वालोें ने अगले दिन चेक “अनपेड” की मुहर लगाकर कॉलेज को लौटा दियां।
जब पूरे तीन हफ्ते बाद कॉलेज के क्लर्क ने आरव को चेक के अनपेड होने की सूचना फोन पर दी तो आरव के चेहरे से रंग उड़ गया।
“मिसमैच? पर… मैंने तो वैसे ही साइन किए थे जैसे आम तौर पर मैं करता हू।”
क्लर्क ने सपाट लहजे में कहा,
“बैंक का नियम है। वैसे ही कॉलेज के नियम भी हैं। अब फीस दोबारा जमा करनी होगी… और ₹2000 फाइन लगेगा।”
₹2000।
यह रकम आरव के लिए सिर्फ पैसा नहीं थी—यह उसकी पहली गलती की कीमत थी। आरव शर्मिंदगी के मारे चुप था। वह यह बात बताने पापा के सामने सिर झुका कर ख्रड़ा हो गया। उसकी आँखों में आंसू थे।
क्रमश: