जहाँ एक शिक्षक का दिया गया उधार, ज़िंदगी भर का फ़र्ज़ बन गया।
उत्तम कुमार तिवारी ” उत्तम “, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
सरोज जी का जीवन सुखमय हो गया था ।
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इधर समय ने करवट ली और सरोज जी के बेटे की पत्नी ने उसके साथ खेल कर दिया था । उसने अपने परिवार के साथ मिल कर सारी संपत्ति अपने नाम करा लिये था और उसको की हर बात पर डपट लेती थी ।
इधर सरोज का लड़का अपने ऑफिस मे एक गबन के मामले मे फस गया था । जिससे उसके खिलाफ थाने मे रिपोर्ट दर्ज हो गई थी । अब सरोज जी का लड़का भागा भागा फिर रहा था । उसको मालुम था कि उसकी माँ शहर के SDM साहेब के घर मे एक माँ की तरह रह रही है और SDM साहेब उनको अपनी माँ के तरह ही रखते है लेकिन उसकी हिम्मत नही पड़ रही थी कि अपनी माँ से मिलकर SDM साहेब की सहायता ले ले । लेकिन उसकी पत्नी और उसके ससुराल वालो ने दबाव बनाया कि तुम अपनी माँ से मिलो वही तुमको बचा सकती है इसके अलावा कोई अन्य उपाय नही है ।
तब सरोज जी के लड़के ने बहुत हिम्मत जुटा कर अपनी माँ से मिलने SDM साहेब के घर गया । वहाँ पर खड़े पुलिस वालो से कहा कि मुझे सरोज जी से मिलना है मै उनका बेटा हूँ । तब एक पुलिस वाले ने अंदर जा कर सरोज जी से कहा कि एक लड़का आया है और वो आपसे मिलना चाहता है जिसका नाम हरीश है और कह रहा है कि वो आपका बेटा हूँ ।
ये बात सुनकर सरोज जी ने अपनी सीने पर पत्थर रख कर कह दिया कि मेरा कोई बेटा नही है मेरा बेटा बहुत पहले ही मर गया था जिस दिन मुझको घर से बाहर निकाला था । ये बात सुनकर पुलिस वाले ने आ कर हरीश से कह दिया । वो निराश हो कर वापस आ गया अपने घर ।
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घर पर देखा तो पता चला कि पुलिस उसको गिरफ्तार करने के लिये आई है तो वो भागने की कोशिश किया लेकिन गिरफ्तार हो कर जेल चला गया । कुछ दिनो बाद उसका मुकदमा उन्ही SDM साहेब की बेंच पर लगा तो SDM साहेब उसको देख कर पहचान गये और अगली तारीख दे दी ।
SDM साहेब घर आये तो सारी बात सरोज जी को बताई । उसकी काली करतूत सुन कर उनका सिर शर्म से झुक गया । तब कुलदीपक ने उनको बड़े प्यार से समझाया कि आखिर वो आपका बेटा है । पुत्र कुपुत्र हो सकता है लेकिन माता कुमाता नही हो सकती है । इसलिये आप एक माँ का फ़र्ज़ का निर्वहन करिये । उसको बचा लीजिये अन्यथा वो जेल चला जायेगा और उसका जीवन बर्बाद हो जायेगा ।
तब सरोज जी ने जो अपनी पेंशन का पैसा बचा के रखी थी वो जमा करके उसको बचा लिया । इधर माँ ने अपना फ़र्ज़ पूरा किया और कुलदीपक ने अपना कर्ज चुकता किया ।
(काल्पनिक रचना)