जहाँ एक शिक्षक का दिया गया उधार, ज़िंदगी भर का फ़र्ज़ बन गया।
उत्तम कुमार तिवारी ” उत्तम “, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
…लेकिन कुलदीपक ने कहा कि नही मै खुद उनको पैसे दुूँगा कृपया आप बता दे कि वो कहाँ मिलेंगी तब लड़के ने कहा कि वो अब वृद्धा आश्रम मे रहती है ।
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कुलदीपक ने उनके लड़के से वृद्धा आश्रम का पता लिया और वहाँ पहुँच गये । कुलदीप ने अपने सारे मातहतो को आश्रम के गेट पर ही रोक दिया और अंदर चले गये । वहाँ स्वागत कक्ष मे एक महिला बैठी थी तो कुलदीप ने उस महिला से सरोज जी के बारे मे पूछ कर सरोज जी के कमरे मे चले गये ।
उस कमरे मे जा कर देखा कि वो एक पुरानी खाट पर लेटी हुई है । उनकी ये दशा देख कर कुलदीप भावुक हो गया और जाकर उनके पैर छुए ।
तब सरोज ने उनका परिचय पूछा कि आप कौन हो तब कुलदीपक ने अपना पूरा परिचय दिया और उनको याद दिलाया कि आपने मुझे 200/- रुपये दिये थे जिससे मैने 100/- के अपनी माँ के लिये चप्पल ले लिया था और 100 रुपये की किताबे ले ली थी । और आपने मुझसे कहा था कि 100/- मै तुम्हे कर्ज के रूप मे दे रही हूँ जब कमाने लगना तब मुझे वापस कर देना अब मै एक अधिकारी बन गया हूँ और कमाने लगा हूँ तो वही आपके पैसे वापस करने आया हूँ ।
ये सुन कर सरोज जी की आँखे भर आई और सोचने लगी कि ये मेरा विद्यार्थी है मुझे मेरे 100 /- वापस करने आया है और एक मेरा बेटा है जिसको मैने अपना सब कुछ दिया वो मुझे आज तक देखने तक नही आया ।
तब कुलदीपक ने सरोज जी से पूरी कहानी सुनी कि आप कैसे यहाँ आई और किन हालात मे आई तब सरोज जी ने कुपलदीप को पूरी बात बताई कि किस तरह से बहू और बेटे ने उनको प्रताड़ित करके घर से निकाल दिया और सारा पैसा भी ले लिया । तब कुलदीपक ये सुन कर रो पड़ा और सरोज जी से कहा कि आप अपना सारा सामान पैक कर लीजिये और मेरे साथ चलिए ।
इतना सुन कर सरोज जी ने बहुत भावुक शब्दों मे पूछा कि तुम हमे कहाँ ले जाओगे तब कुलदीपक ने कहा कि जहाँ आपको रहना चाहिए वहाँ लेकर आपको चल रहा हूँ ।
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कुलदीपक सरोज जी को लेकर अपने घर पहुँचा जैसे ही कुलदीप अपने घर पहुँचा कुलदीपक के दोनो बच्चे दौड़ पड़े कि पापा आ गये । कुलदीपक ने बड़े सम्मान के साथ सरोज जी को अपनी गाडी से उतारा और घर के अंदर ले गये वहाँ कुलदीप ने अपनी माँ और अपनी पत्नी बच्चो से सरोज जी को मिलवाया । सब लोग सरोज जी से मिल कर बहुत खुश हुए क्यूकी कुलदीपक ने अपनी सारी बात सबको बता रखी थी ।
कुलदीपक ने पहले एक महिला डाक्टर को बुला कर सरोज जी के स्वास्थ्य का परीक्षण करवाया और उनको कुछ दवाए भी लाकर दिया जो कुलदीप स्वयं अपने हाथों से सरोज जी को खिलता था और सब लोग साथ मे बैठ कर खाना खाते थे ।
धीरे धीरे सरोज जी बिल्कुल स्वस्थ्य हो गई क्यु कि उनको एक परिवार का प्रेम मिल गया था । कुलदीपक के दोनो बच्चे सरोज जी को पाकर बहुत खुश हो गये थे और सरोज जी भी पौत्र पौत्री का सुख पा गई थी । सरोज जी का जीवन सुखमय हो गया था ।
क्रमश: