“लक्ष्मी वहीं आती हैं जहाँ कर्म दीपक जलता है।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
बृजेश बहुत धार्मिक युवक था। उम्र लगभग पैंतीस, पर जिम्मेदारियों की दुनिया में कदम कम ही रखा था। सुबह से रात तक पूजा, मंत्र जाप, भजन—बस यही दिनचर्या थी। मन में एक ही आकांक्षा—“देवी लक्ष्मी प्रसन्न हो जाएं… और जीवन में धन वर्षा होने लगे।”
घर की महिलाओं—उसकी पत्नी राधिका और बूढ़ी मां सावित्री देवी—को उससे बहुत उम्मीदें थीं। लेकिन महीनों बीत गए, पूजा कमरे की धूप अगरबत्ती तो खूब जलीं, पर घर के हालात नहीं बदले। खर्च बढ़ते गए और आय शून्य रही।
राधिका की थकी आवाज
एक शाम राधिका ने धीमे स्वर में कहा,
“बृजेश, भक्ति अच्छी बात है… पर क्या केवल पूजा से जीवन चलता है? हमें भी थोड़ी सहारा चाहिए।”
बृजेश भावुक हो गया।
“राधिका, मैं जानता हूँ। पर देखना, देवी लक्ष्मी कब तक मेरी सच्ची भक्ति को अनदेखा करेंगी?”
सावित्री देवी ने आह भरी—
“बेटा, जो देवी मेहनती का हाथ थामती हैं, वो खाली हाथ वालों की नहीं सुनतीं। दुनिया कर्म से चलती है।”
बृजेश चुप हो गया। पर उसकी भक्ति अभी भी अडिग थी।
भाग्य का मोड़ – एक उद्यमी से मुलाक़ात
एक दिन गाँव के मंदिर में एक चमकीली साड़ी पहने, आत्मविश्वास से भरी एक महिला आई—कव्या अग्रवाल, जो शहर की एक सफल उद्यमी थी।
वह पूजा के बाद बाहर निकली तो बृजेश उसे प्रसाद बाँटते दिख गया। कव्या ने मुस्कराते हुए प्रसाद लिया और बोली—
“लगता है, आप यहाँ के पुजारी हैं?”
“नहीं बहन, मैं बस पूजा-पाठ में ही अपना समय देता हूँ। देवी की कृपा से एक दिन सब ठीक हो जाएगा।”
कव्या ने उसकी आँखों में उम्मीद देखी, पर व्यवहार में कमजोरी भी। उसने पूछा—
“और कमाने-धमाने का क्या करते हैं?”
“अभी कुछ नहीं। अभी तो सिर्फ देवी की भक्ति करता हूँ। लक्ष्मी खुद आ जाएंगी।”
कव्या कुछ पल चुप रही, फिर बोली—
“क्या आप सच जानते हैं कि देवी लक्ष्मी का असली संदेश क्या है?”
बृजेश ने आश्चर्य से पूछा—
“क्या मतलब?”
क्रमश: