“लक्ष्मी वहीं आती हैं जहाँ कर्म दीपक जलता है।”
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प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
…बृजेश ने आश्चर्य से पूछा—
“क्या मतलब?”
कव्या मुस्कराई—
“बैठिए… मैं आपको एक कहानी सुनाती हूँ—समुद्र मंथन की कहानी।”
समुद्र मंथन की सीख
कव्या ने कहा—
“जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया ना बृजेश, तो लक्ष्मी तुरंत नहीं आईं।
पहले विष निकला, संघर्ष निकला, कठिनाइयाँ निकलीं।
और जब दोनों पक्षों ने पूरा परिश्रम किया, तब कहीं जाकर लक्ष्मी प्रकट हुईं!”
वह थोड़ी गंभीर हुई—
“सोचिए—देवता भी बिना मेहनत के लक्ष्मी नहीं पा सके… तो हम इंसान कैसे पा सकते हैं?”
बृजेश चुपचाप सुनता रहा।
उसके भीतर कहीं कुछ हलचल सी हुई।
राधिका की आँखों में उम्मीद
उस शाम बृजेश ने घर आकर राधिका से कहा—
“राधिका… मुझे लगता है, मैं अब तक गलत रास्ते पर था। देवी चाहती तो मेरा कल्याण कर ही देतीं… पर शायद वो चाहती हैं कि मैं खुद कदम बढ़ाऊं।”
राधिका की आँखें नम हो गईं—
“बस यही बात मैं कब से कहना चाह रही थी…”
सावित्री देवी ने भी उसका सिर सहलाते हुए कहा—
“बेटा, असली पूजा वही है जो परिवार को सुख दे।”
नया निर्णय – नया जीवन
अगले दिन बृजेश ने कव्या से फिर मुलाक़ात की।
कव्या ने उसे छोटे रोजगारों के बारे में बताया—
आचार बनाना, हर्बल अगरबत्ती व्यवसाय, पूजा सामग्री सप्लाई—जो उसके स्वभाव के अनुकूल भी थे।
बृजेश ने पूछा—
“पर मैं व्यापार समझता नहीं…”
कव्या हँस पड़ी—
“सीख जाओगे! समुद्र मंथन भी पहली बार हुआ था।”
उसने बृजेश को तीन दिन का फ्री ट्रेनिंग सेशन दिया।
राधिका ने भी साथ दिया—
“मैं अचार बनाऊंगी। तुम सप्लाई देखना।”
धीरे-धीरे काम बढ़ने लगा। पहली कमाई जब हाथ में आई तो बृजेश की आँखें नम हो गईं।
वह बोला—
“राधिका… लगता है आज सच में देवी लक्ष्मी प्रसन्न हो गईं!”
राधिका ने मुस्कराते हुए कहा—
“नहीं… आज तुमने उन्हें बुलाया है — अपने कर्म से।”
कव्या की अंतिम सीख
एक दिन कव्या दुकान पर आई और बोली—
“तो बृजेश जी, अब समझ गए?”
बृजेश ने folded hands के साथ कहा—
“हाँ दीदी… लक्ष्मी माँ पूजा से नहीं,
मेहनत और कर्म से आती हैं।”
कव्या ने सिर हिलाया—
“भक्ति बहुत जरूरी है…
पर कर्महीन भक्ति केवल भ्रम है।”
सकारात्मक अंत
कुछ महीनों में बृजेश का छोटा सा व्यवसाय गाँव का मशहूर व्यवसाय बन गया।
घर में खुशहाली लौटी, राधिका के चेहरे पर चमक आई, और सावित्री देवी गर्व से भर उठीं।
हर शाम पूजा के बाद बृजेश दीपक जलाता और धीरे से कहता—
“हे लक्ष्मी माँ,
मैं अब भी आपका भक्त हूँ…
पर अब मैं आपका कर्मयोगी भी हूँ।”
और ऐसा लगता मानो दीपक की लौ मुस्कराकर कहती—
“यही है सच्ची पूजा।”
(काल्पनिक रचना)