“जब जिम्मेदारी पूरी होती है, तब किस्मत भी करवट बदलती है।”
विजय कुमार तैलंग, जयपुर (राजस्थान)
रोहित ने फिर पूछा – “क्या शहर में रहने का मौका मिले तो कॉलेज जाना चाहोगी? “
“ऐसा मौका कौन देगा बाबूजी? “
“मैं, तुमसे शादी करके! ”
रोहित की बात पर एक बार सुरीली को लगा कि उसने कुछ गलत तो नहीं सुन लिया लेकिन रोहित ने फिर ये कहकर बात की पुष्टि कर दी कि वह उसे अपनी जीवन संगिनी बनाना चाहता है और यदि वह आगे पढ़ना चाहेगी तो वह खुशी खुशी उसे पढ़ाने का मौका देगा। ये कब हुआ? वह स्वयं से ही मानो पूछ बैठी। बहरहाल उसने कह दिया कि वह बापू से पूछकर बताएगी।
एक दिन रात्रि भोजन करते हुए बाप बेटी में इस प्रकार बात हुई;-
“बापू, तू परेशान क्यों रहता है? “
“बेटी, मैं बूढ़ा हो रहा हूँ। जिंदगी का कोई भरोसा भी नहीं, कब ऊपर वाला बुला ले। मैं तेरा ब्याह करके निश्चिंत होना चाहता हूँ।”
“… फिर तेरी देख भाल कौन करेगा बापू? “
“बेटी, बेटी पराया धन होती है। मेरा क्या है। मैं अभी अपना ख्याल रख लूंगा पर अगर तेरा ब्याह न करा पाया तो भगवान मुझे कभी माफ नहीं करेगा। “
“… तो ठीक है बापू, करा देना मेरा ब्याह! “
“बेटी, तेरे ब्याह के लिए कई लोगों ने मुझे पूछ लिया लेकिन मैंने उन्हें या तो टाल दिया या इन्कार कर दिया। “
“क्यों बापू? “
“वे लोग अनपढ़ और हमारी तरह गरीब हैं। तुझे मैं कोई अच्छे सम्पन्न घर की बहू बनी देखना चाहता हूँ बेटी इसीलिए मैंने तुझे पढ़ाया लिखाया है पर लगता है मेरी यह इच्छा सपना ही बन कर रह जायेगी। “
“बापू, अगर मेरा ब्याह कोई संपन्न घर में करा देने से तेरी सारी चिंता मिट जायेगी और तू खुश होगा और अधिक जी सकेगा तो मैं ब्याह के लिए तैयार हूँ। “
दयाराम ने बेटी से वो बात पूरी तरह छुपा ली थी जो त्रिपुण्डधारी बाबा ने बताई थी कि उसकी दूसरे माह की अमावस्या की रात में मृत्यु हो जायेगी। वो समय जल्दी ही आने वाला था।
“वो तो ठीक है बेटी पर अभी तक मुझे ऐसा रिश्ता दिखाई नहीं पड़ रहा जहाँ तेरे ब्याह की बात करूँ।”
“… अगर मैं बता दूँ बापू? “
क्रमश: