“जब जिम्मेदारी पूरी होती है, तब किस्मत भी करवट बदलती है।”
विजय कुमार तैलंग, जयपुर (राजस्थान)
“कल बताऊंगा। ” दयाराम बोला और काम में व्यस्त हो गया।
दयाराम घर लौटा तो सुरीली बोली, “बापू, मैं भी काम करूँगी। तेरा हाथ बटाऊंगी!”
“यानी पढ़ी लिखी हो के मजदूरी करेगी? “
“बापू, तू आखिर कब तक करता रहेगा? तू बीमार भी हो जाता है। मैं कुछ न कुछ कर लूंगी। पढ़ाई लिखाई का न सही, तो भी! “
“पढ़ाई लिखाई का एक काम है। “
दयाराम ने ठेकेदार से हुई बातचीत उसको बता दी।
सुरीली खुश होकर बोली, “बापू, ये काम मैं कर लूँगी। हम साईकिल पर साथ साथ जाया करेंगे और लौट भी आया करेंगे। “
“….. लेकिन बेटी तू वहाँ सुपरवाइजर होगी और मैं निरा मजदूर! तू साईकिल पर चली जाया कर, मैं पैदल ही जाऊंगा। “
“बापू..? “
आखिर बापू मान गया।
दोनों अस्पताल की निर्माण साइट पर काम करने जाने लगे। सुरीली रोज मजदूरों का रजिस्टर देखती, उनकी हाजिरी लगाती, उन्हें औजार देती और शाम को छुट्टी पर सबके औजार लेकर स्टोर में ताला लगा उसकी चाबी ठेकेदार के बेटे रोहित को थमाकर बापू के साथ घर लौट आती।
रोहित खुद इंजीनियरिंग कर रहा था। दिन भर वह पढ़ाई करता और शाम को थोड़ी देर को साइट पर आता था और उसी दौरान सुरीली से चाबी लेता था। इसी लेने-देने के चक्कर में उसे सुरीली अच्छी लगने लगी थी। इस विषय में उसने अपने ठेकेदार पिता को भी बता दिया था। दोनों पिता पुत्र खुले दिमाग के थे और अपनी बातें एक दूसरे से बेसाख्ता बता दिया करते थे।
“तुम कहाँ तक पढ़ी हो? ” सुरीली से एक शाम चाबी लेते हुए रोहित ने पूछा।
“बारहवीं तक! “
“आगे..? “
“कॉलेज में दाखिल नहीं हो सकी क्योकि कॉलेज शहर में है और हमारे गाँव से बहुत दूर है। “
रोहित ने फिर पूछा – “क्या शहर में रहने का मौका मिले तो कॉलेज जाना चाहोगी? “
क्रमश: