“जब जिम्मेदारी पूरी होती है, तब किस्मत भी करवट बदलती है।”
विजय कुमार तैलंग, जयपुर (राजस्थान)
…ये भभूत ले जा और रोज प्रात: काल इसकी एक चुटकी पानी के साथ निगल लेना। इससे तुझे पेट दर्द से राहत मिलेगी। ला, सौ रुपये दे!
दयाराम भभूत लेकर और सौ रुपये बाबा के पग में रखकर लौट आया। उसने इस बारे में सुरीली को कुछ बताना ठीक न समझा। उसे अपने जीवन की इतनी फिक्र नहीं थी जितनी सुरीली के ब्याह की अत: वह दिन रात अपने काम में जुट गया। समय काफी कम था और जिम्मेदारी बड़ी थी।
इधर सुरीली सयानी हो गई थी और उसकी खूबसूरती चार चाँद लगाने लगी थी जिससे वह गाँव में दबे छुपे चर्चा का विषय बनने लगी थी। गाँव के बुजुर्ग भी चर्चा करते थे, “पढ़ाई के चक्कर में दयाराम ने लड़की को बछिया से गाय बना ली, बचपन में ब्याह देता तो पिंड छूट जाता। अब चिंता फिकर में पड़ा है। ”
“पढ़ी लिखी है तो कोई न कोई रिश्ता तो आ ही जायेगा! ” दूसरा बुजुर्ग बोलता।
“रिश्ता तो आ जायेगा किसी विधुर या बड़ी उमर वाले का भी लेकिन वो दहेज की मांग करेगा तो दयाराम कैसे भरपाई करेगा?”
“मकान बेचेगा और क्या? ” तीसरा बुजुर्ग हुक्का गुड़गुड़ाने के बाद धुआँ छोड़ते हुए कहता।
वहाँ गाँव से तीन किलोमीटर दूर एक अस्पताल का भवन निर्माण हो रहा था। दयाराम भी उसमें मजदूरी में लगा हुआ था।
वहाँ के ठेकेदार ने दयाराम से पूछा कि गाँव में कोई पढ़ा लिखा आदमी है क्या?
दयाराम को सुरीली की याद आ गई लेकिन उसने पूछा – “काम क्या होगा?”
“कुछ खास नहीं, बस रजिस्टर में मजदूरों की दिहाड़ी लिखनी होगी, उन्हें सुबह सुबह स्टोर से औजार देना होगा और शाम को जमा करके स्टोर में ताला मारकर चाबी मेरे बेटे रोहित को देनी होगी जो इसी साइट पर काम देख रहा है। ”
“क्या तनखा देंगे? ” दयाराम का दूसरा सवाल था।
“पहले ये तो बता कि कोई है भी या नहीं 8वीं, 10वीं पास या फेल? “
“कल बताऊंगा। ” दयाराम बोला और काम में व्यस्त हो गया।
क्रमश: