“जब जिम्मेदारी पूरी होती है, तब किस्मत भी करवट बदलती है।”
विजय कुमार तैलंग, जयपुर (राजस्थान)
दयाराम चाहता था कि उसकी जो जिम्मेदारी अपनी इकलौती पुत्री ‘सुरीली’ के लिये है, वो उसे अपने इस छोटे से जीवन में पूरी कर जाये, फिर सुकून से मर जाये। ये मरने की बात उसके पेट दर्द से शुरू हुई थी जिसके उपचार के लिए वह पास ही किसी बाबा के पास गया था और बाबा ने उसकी मृत्यु का दिन निश्चित कर दिया था। वह अंधविश्वासी तो था ही अत: उसने इस बात पर विश्वास भी कर लिया था कि वह ज्यादा नहीं जियेगा और जैसा बाबा ने बताया है उसकी मौत निश्चित ही आ जायेगी।
वह मजदूरी करके जैसे तैसे अपना व अपनी बेटी का गुजारा करता था। उसके पास इतना पैसा नहीं था कि अपना इलाज किसी अच्छे अस्पताल में करा सके। खेतों पर मजदूरी करता, मिस्त्री के संग बेलदारी करता और खेतों से सब्जी लेकर कभी कभी टोकरी में बेचने निकल पड़ता था। उसके पास संपत्ति के नाम पर एक छोटा सा मकान था जिसके दम पर उसने कई कई बार कर्ज लेकर अपनी बेटी को बारहवीं तक पढ़ाया था। वह चाहता था कि वह उसकी पढ़ी लिखी बेटी का रिश्ता किसी संपन्न घर में हो जाये।
सुरीली सुंदर थी और घर के सभी कामों मे कुशल थी। वह अपने बापू का बहुत खयाल रखती थी। उसके बापू ने उसकी पढ़ाई पूरी कराने में जी जान लगा दिया था वरना तो उसके गाँव में पाँचवी कक्षा से आगे कोई लड़की पढ़ न पाई थी। बापू ने उसे गाँव से बाहर कस्बे के स्कूल में दाखिल करवाया था और आने जाने के लिए एक साइकिल भी दिलवाई थी। वह जानती थी कि उसकी पढ़ाई की कीमत कर्ज से पूरी की गई थी जो बापू अभी तक चुका रहा था। बापू के बार बार पेट में दर्द से वह चिंतित हो जाती थी और चाहती थी कि वह किसी अस्पताल में अपना इलाज कराये लेकिन उसके बापू के पास इतना पैसा कहाँ था? वह कई बार बापू से कहती कि वह भी मजदूरी करके बापू की मदद करेगी लेकिन बापू उसे ऐसा करने से मना कर देता था।
“बेटी, तेरा ठिकाना किसी अच्छे घर में कर दूँ तब चैन की नींद सो जाऊंगा। ” दयाराम कहता।
इस पर सुरीली कहती, “बापू पहले अपना इलाज करवा ले, मेरी किस्मत में जो होगा देखा जायेगा।”
दयाराम फीकी हंसी हंसकर चुप हो जाता।
क्रमश: