“संक्रांति—जहाँ सूर्य, विज्ञान और संस्कृति एक ही धुरी पर घूमते हैं।”
— श्यामकांत देशपांडे, नागपुर (महाराष्ट्र)
…कृषिप्रधान भारत में यह फसल के स्वागत का पर्व भी है। तिल के लड्डू और खिचड़ी इस दिन का पवित्र प्रसाद माने जाते हैं।
मेष संक्रांति
मेष संक्रांति पारंपरिक हिंदू सौर पंचांग में नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है। सूर्य के मेष राशि में प्रवेश पर यह पर्व सामान्यतः 14 या 15 अप्रैल को आता है।
यह विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है—
केरल में विशु, तमिलनाडु में पुथांडु, निकटवर्ती क्षेत्रों में बिसू पर्व, पंजाब में बैसाखी, ओडिशा में पणा संक्रांति, बिहार (मिथिला-भोजपुरी क्षेत्र) में सतुआन, बंगाल में अगले दिन पोइला बैशाख, असम में बोहाग बिहू, श्रीलंका में अबुरुद्धू और दक्षिण-पूर्व एशिया में सोंगक्रान।
धनु संक्रांति
यह सौर मास के पहले दिन मनाई जाती है। दक्षिणी भूटान और नेपाल में इसे दारुल (जंगली आलू) पर्व कहा जाता है, जो इस दिन का प्रमुख भोजन होता है।
कर्क संक्रांति
16 जुलाई को सूर्य के कर्क राशि में प्रवेश के साथ उत्तरायण काल की समाप्ति और दक्षिणायन का प्रारंभ होता है, जो मकर संक्रांति तक चलता है।
सिंह संक्रांति
भाद्रपद मास के प्रथम दिन जम्मू मंडल के रामबन क्षेत्र में इसका विशेष महत्व है। लोग चंद्रभागा नदी में पुष्प अर्पित कर यह पर्व मनाते हैं। मान्यता है कि इसका प्रारंभ पांडवों ने किया था।
नोल संक्रांति
यह कार्तिक मास का प्रथम दिन होता है, जिसे डाक संक्रांति भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि जब धान की फसल पकती है, तब नोल पौधों से जुड़ा एक विशेष अनुष्ठान किया जाता है। प्रसाद स्वरूप Borassus flabellifer (ताड़) के बीज वितरित किए जाते हैं।
संक्रांति और ब्रह्मांडीय समय-चक्र
हिंदू पर्व ब्रह्मांडीय समय-प्रबंधन का महत्वपूर्ण अंग हैं। दक्षिणायन सूर्य से शरीर, मन और वातावरण में विकार उत्पन्न हो सकते हैं, जबकि उत्तरायण सूर्य मन में उत्साह और सकारात्मकता भरता है। यही कारण है कि हमारे सभी पर्व खगोलीय घटनाओं से जुड़े हुए हैं।
ऋतु परिवर्तन, मानव मनोविज्ञान, सामाजिक कर्तव्य और ध्यान की प्रवृत्ति—इन सभी का समन्वय संक्रांति पर्वों में दिखाई देता है। यह एक सिद्ध तथ्य है कि ऋतु के विपरीत आचरण और अनुचित भोजन से जीवन कष्टप्रद हो जाता है। वर्षा ऋतु में होने वाले अधिकांश रोग इसका सटीक उदाहरण हैं।
धर्माचार्यों के अनुसार सूर्य की उत्तरी यात्रा देवताओं का दिन और दक्षिणी यात्रा उनकी रात्रि मानी जाती है। संक्रांति काल की सूक्ष्म गणना भारतीय खगोल विज्ञान में समय-विभाजन के अद्भुत ज्ञान को दर्शाती है।
जिस समय में एक स्वस्थ मनुष्य पलक झपकाता है, उसका 30वाँ भाग ‘तत्पर’ कहलाता है। तत्पर का 100वाँ भाग ‘त्रुटि’ होता है। त्रुटि के 100वें भाग के समय में सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है। चूँकि यह समय अत्यंत सूक्ष्म होता है, इसलिए इसके पहले और बाद की 16 घड़ियों को शुभकाल माना जाता है।
त्रुटि का 100वाँ भाग अनाम कहलाता है। त्रुटि के 100 गुना तत्पर, और 30 गुना निमेष होते हैं। 18 निमेष = 1 काष्ठा, 30 काष्ठा = 1 कला, 30 कला = 1 मुहूर्त, 30 मुहूर्त = 1 दिन।
6 महीनों का 1 अयन, जिसे देवताओं का एक दिन माना गया है।
भारतीय खगोल विज्ञान में वर्ष की 12 संक्रांतियों को मुख्यतः चार श्रेणियों में बाँटा गया है—
अयन (संक्रांति), विषुव, विषुपदी और षष्टिमुखी।
मकर संक्रांति के दिन गुजरात में अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव, उत्तर प्रदेश में खिचड़ी पर्व, असम में फसल उत्सव, और पंजाब में लोहड़ी व माघी के रूप में यह पर्व मनाया जाता है। तिल और गुड़ से बनी मिठाइयों का विशेष महत्व है।
यह सांस्कृतिक और वैज्ञानिक पर्व पूरे भारत में अत्यंत उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।