“संक्रांति—जहाँ सूर्य, विज्ञान और संस्कृति एक ही धुरी पर घूमते हैं।”
— श्यामकांत देशपांडे, नागपुर (महाराष्ट्र)
संपूर्ण विश्व में सूर्य का शाब्दिक अर्थ है—सर्व-प्रेरक। इस धरा पर सूर्य का महत्व अपार है। पृथ्वी पर जीवन का आधार सूर्य ही है। उसके प्रकाश और ऊर्जा से ही प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया संभव होती है, जिससे पौधे अपना भोजन और प्राणवायु का निर्माण करते हैं। यही प्राणवायु समस्त जीवन का मूल आधार है। सूर्य मौसम और जलवायु को नियंत्रित करता है।
भारत में सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कारणों से सूर्य का विशेष महत्व है। अनेक धर्मों में सूर्य को देवता माना गया है। इनमें ईराक का प्राचीन कुर्द एकेश्वरवादी यज़ीदी धर्म, पारसी धर्म, सूफीवाद, पूर्व-ईसाई परंपराएँ शामिल हैं। प्राचीन मिस्र के लोग तथा बौद्ध भी सूर्य-पूजक रहे हैं।
भारत में छठ पूजा, संक्रांति (पोंगल) जैसे पर्व सूर्य-उपासना को समर्पित हैं। आयुर्वेद में सूर्य को स्वास्थ्य का प्रमुख कारक माना गया है। आदित्यहृदय स्तोत्र सूर्य-उपासना का प्रसिद्ध स्तोत्र है। यजुर्वेद में “चक्षोः सूर्यो जायते” कहकर सूर्य को भगवान की आँख माना गया है।
भारतीय खगोल विज्ञान की वैज्ञानिक दृष्टि
खगोलीय एवं गणनात्मक विज्ञान में भारत सदैव अग्रणी रहा है। ऋग्वेद के 50/4 श्लोक में पृथ्वी की सूर्य से दूरी तथा उससे आने वाले प्रकाश की गति को लेकर स्पष्ट गणना मिलती है—
“योजनानां सहस्त्र द्वे शते, द्वे च योजना अकेन निमिषाधेना क्रमाणां नमोऽस्तुते।”
इसके अनुसार पृथ्वी और सूर्य की दूरी लगभग 15 करोड़ 36 लाख किलोमीटर मानी गई है। प्रकाश की गति को 2202 योजन प्रति अर्ध निमिष बताया गया है।
एक निमिष वह समय है, जितना एक स्वस्थ मनुष्य को पलक झपकाने में लगता है। योजन प्राचीन दूरी मापने की इकाई है, जो लगभग 8 से 10 मील के बराबर मानी जाती है। यह गणनाएँ आधुनिक नासा के आँकड़ों के अत्यंत निकट हैं।
संक्रांति का वैज्ञानिक अर्थ
संक्रांति का अर्थ है—सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना। वर्ष में कुल 12 संक्रांतियाँ होती हैं। भारत में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल और ओडिशा में संक्रांति का सीधा संबंध विज्ञान और ऋतु परिवर्तन से है।
दक्षिणी गोलार्ध में ग्रीष्म संक्रांति उस समय होती है, जब सूर्य ठीक मकर रेखा के ऊपर होता है। सामान्यतः 21 दिसंबर को संक्रांति के अगले दिन या पूरे वर्ष के दौरान ग्रीष्म ऋतु में सूर्य का प्रकाश कम-अधिक होता रहता है।
पंचांग और सौर वर्ष
पारंपरिक भारतीय पंचांग चंद्र स्थिति पर आधारित है, जबकि मकर संक्रांति एक शुद्ध सौर घटना है। इसकी तिथि प्रायः 14 या कभी-कभी 15 जनवरी होती है, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है।
भारतीय खगोल विज्ञान में सौर वर्ष 12 संक्रांतियों का माना जाता है, जिन्हें बारह महीनों में विभाजित किया गया है। इसे मुख्य रूप से चार भागों में बाँटा गया है—
अयन (संक्रांति), विषुव, विषुपदी और षष्टिमुखी।
दक्षिण भारत, बिहार का मिथिला क्षेत्र और नेपाल में संक्रांति विशेष रूप से नक्षत्र-आधारित सौर पंचांग से जुड़ी होती है। बंगाली सौर पंचांग में प्रत्येक माह के अंत में संक्रांति आती है।
प्रमुख संक्रांतियाँ
मकर संक्रांति
मकर संक्रांति सनातन संस्कृति का अत्यंत पावन और शुभ पर्व है। यह प्रकृति, सूर्य-उपासना और मानव जीवन के बीच संतुलन को दर्शाता है। विभिन्न नामों से मनाए जाने के बावजूद इसका मूल भाव एक ही है—सूर्य देव की उपासना।
सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ यह पर्व उत्तरायण की शुरुआत का प्रतीक है। महाभारत के अनुसार, भीष्म पितामह ने उत्तरायण की प्रतीक्षा कर इसी काल में देह त्याग किया। कृषिप्रधान भारत में यह फसल के स्वागत का पर्व भी है। तिल के लड्डू और खिचड़ी इस दिन का पवित्र प्रसाद माने जाते हैं।
क्रमश: