“जहाँ प्रेम ही पूजा बन जाए, वहाँ मन कभी बंधता नहीं।”
चन्द्रमती चतुर्वेदी, बस्ती (उत्तर प्रदेश)
सारांश:
पहली कविता आत्मिक और आध्यात्मिक प्रेम की गहन अभिव्यक्ति है, जहाँ कवयित्री का मन और आत्मा पूर्णतः आराध्य को समर्पित हो जाते हैं। प्रिय के बिना न मन को चैन है, न जीवन को अर्थ—प्रेम यहाँ आस्था और पूजा का रूप ले लेता है। दूसरी कविता प़़ुत्र के प्रति अंधे प्रेम के प्रति आगाह करते हुए मानवता, नैतिकता और सामाजिक मूल्यों को मनुष्य होने की सच्ची पहचान बताती है। नारी, माता-पिता और संबंधों के प्रति असम्मान को कवयित्री ने घोर निंदनीय और अमानवीय ठहराया है। यह कविता समाज में गिरते मूल्यों पर गहरी पीड़ा व्यक्त करते हुए आत्मचिंतन और सुधार का आह्वान करती है।आइए, अब इन्हें पढ़ें विस्तार से—
मन बंधता नहीं
मन बंधता नही बस चलता नही
भाव मेरे दिल का है रुकता नही
कभी देखू इधर, कभी देखूं उधर
कोई तेरे सिवा मन को जंचता नही
पूज्य मेरे तुम्ही, मेरेआरध्य हो
चाहत मेरे तुम्ही, मेरे आराध्य हो
अब तुम्हारे बिना चैन मिलता नही
भाव मेरे………….
मेरी नजरें सदां ही तुम्हे ढूंढ़ती
छुप के बैठे कहाँ हो तुम्हें खोजती
कैसै बांधे इसे, प्रेम बंधता नही
भाव मेरे……….
नैन में आ बसे हो, रहोगे बसे सदा
नेह बंधन का अब तोड सकते नही
जी सकेंगे तुम्हारे बिना अब नही
भाव मेरे………………..
प्रेम करते हैँ कितना बता न सकें
माप होता नही आंक हम न सकें
कैसे समझाऊँ, हो तुम समझते नही
भाव मेरे……………
आस तुमसे लगा मेरा विश्वास है
प्यार तुमको भी है मेरा एहसास है
बात दिल की मुझे तुम बताते नही
भाव मेरे………………..
चाहते हो अगर लो परीक्षा मेरा
मन मंदिर में मेरे है मूरति तेरा
तुमको विश्वास है क्या मेरा नही
भाव मेरे………………
*****************
मैरा लाल नहीं
जिनके मन अनुराग नही
वह मानुष तन उदगार नही,इस धरती पर
उसका जीवन केवल पशु समान रही
जो मात पिता और बहन बेटियों का है करता सम्मान नही,
इस धरती पर भार रूप है जीने का अधिकार नही
मानवता की हानि करे जो मन में सोच विचार नही,
निंदनीय जो करे कार्य वह कहलाता इंशान नही
मिथ्या भाषी मित्र मिले गर करना कभी विश्वास नही,
संग रहे सब काम बिगाड़े होता कभी विकास नही
पुत्र रत्न जग उत्तम माने, उस पर रखते नाज सभी,
ज्ञान धरम प्रवीण पुत्र हो जीवन सार्थक मान सही
करते नारी निंदा जो हैं देते मान सम्मान नही,
भूल गये कर्तव्य अपनी
मर्यादा के पात्र नहीं, नारी द्वारा रचित हुई है
सृष्टि की संचार सही
सहज नही है जग मे जीना जिसको है अभ्यास नही,
घर घर में हैँ रावण बसते राम का नाम निशान नही
भारत माँ है आज बिलखती
ऐसी दसा निहार रही
धिक्कार मुझे जो पुत्र पुकारूं
तू है मैरा लाल नही, तू हैँ मेरा लाल नही