जब माँ का हक़ परिवार की ज़रूरतों में दब गया, तब न्याय माँगने माँ खुद अदालत पहुँच गईं।
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
पर यह सहारा धीरे-धीरे सौदेबाज़ी में बदल जाएगा, यह उन्हें कहाँ पता था।
जिम्मेदार बेटों की राजनीति
अशोक मेहता की सेवा के बदले सरकार ने ₹85,000 मासिक पेंशन तय की थी।
रिटायरमेंट के बाद उनका नाम प्रशासन में आदर से लिया जाता था, और अब वही पेंशन शारदा देवी का सहारा थी।
राहुल हर रविवार को आता।
कॉफी मग हाथ में, लैपटॉप खोले बैठता।
“माँ, नोएडा में जमीन के दाम दोगुने हो रहे हैं। बस कुछ महीने आपकी मदद चाहिए, मैं पेंशन से थोड़ा निवेश कर दूँ, बाद में सब आपके नाम पर रहेगा।”
शारदा ने झिझकते हुए पूछा,
“पापा हमेशा कहते थे — ‘बुढ़ापे की रकम, बुढ़ापे में ही काम आती है।’ बेटा, ध्यान रखना ये पैसा सहारे के लिए है, शान के लिए नहीं।”
राहुल ने हँसते हुए कहा,
“अरे माँ, आप भी! ये तो निवेश है, फिजूलखर्ची नहीं।”
धीरे-धीरे हर महीने की पेंशन उसके अकाउंट में जाने लगी।
रसीदें, फॉर्म, सब कुछ राहुल संभालता — और शारदा विश्वास करतीं।
कुछ महीने बाद सुमित आया।
“माँ, आर्यन का IIT कोचिंग का एडमिशन हो गया है। सालभर की फीस तीन लाख है, थोड़ा मदद कर दो।”
शारदा ने कहा,
“पढ़ाई में लगना पुण्य है बेटा, पर ध्यान रखना — माँ की दवा और कोचिंग की फीस एक साथ चलनी चाहिए।”
बेटे मुस्कुरा कर चले गए, पर वो मुस्कान सिर्फ कर्तव्य निभाने जैसी थी।
दिन गुजरते गए।
पेंशन का अधिकांश हिस्सा बेटों के खर्चों में चला जाता।
शारदा की दवाइयाँ उधार पर आने लगीं।
हर महीने वो अपनी डायरी में लिखतीं —
“अशोक जी, हमारे बच्चे अब समझते हैं कि माँ की ममता एटीएम कार्ड की तरह होती है — जहाँ हर ज़रूरत पर निकासी की जा सकती है।”
क्रमश: