जब माँ का हक़ परिवार की ज़रूरतों में दब गया, तब न्याय माँगने माँ खुद अदालत पहुँच गईं।
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
हर महीने वो अपनी डायरी में लिखतीं —
“अशोक जी, हमारे बच्चे अब समझते हैं कि माँ की ममता एटीएम कार्ड की तरह होती है — जहाँ हर ज़रूरत पर निकासी की जा सकती है।”
दिल की तकलीफ़
जनवरी की एक सर्द सुबह।
हीटर बंद था, बिजली चली गई थी।
शारदा देवी को सीने में जलन और दर्द महसूस हुआ।
मिसेज़ कपूर ने देखा —
“अरे शारदा जी, चेहरा नीला पड़ रहा है! उठिए, जल्दी!”
वो उन्हें AIIMS लेकर दौड़ीं।
डॉक्टर ने रिपोर्ट देखते हुए कहा —
“तीन ब्लॉकेज हैं। तुरंत एंजियोप्लास्टी करनी होगी। खर्च लगभग डेढ़ लाख।”
मिसेज़ कपूर ने तुरंत राहुल को फोन लगाया।
“बेटा, तुम्हारी माँ अस्पताल में हैं, हालत गंभीर है।”
राहुल की आवाज़ आई —
“आंटी, मीटिंग में हूँ, थोड़ी देर में आता हूँ।”
सुमित से बात की गई, उसने कहा —
“आंटी, कल सैलरी क्रेडिट होगी, तब देखता हूँ।”
मिसेज़ कपूर ने गुस्से में कहा,
“जब माँ की साँसें अटक रही हैं तब तुम्हारे लिए मीटिंग और EMI ज़रूरी हैं? शर्म आनी चाहिए!”
दोनों चुप।
आख़िर मिसेज़ कपूर ने अपने बेटे के कार्ड से एडवांस दिया।
ऑपरेशन सफल रहा।
पर शारदा देवी के अंदर कुछ टूट चुका था —
विश्वास।
डिस्चार्ज के बाद उन्होंने अपनी डायरी में लिखा —
“दिल पर जख़्म डॉक्टर ने भरा, पर आत्मा का कौन भरेगा? अब मैं किसी के लिए बोझ नहीं बनूँगी।”
अदालत की चौखट
दो महीने बाद दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर पत्रकारों की भीड़ थी।
बोर्ड पर लिखा था —
“श्रीमती शारदा मेहता बनाम राज्य सरकार — इच्छा मृत्यु संबंधी याचिका।”
क्रमश: