जब माँ का हक़ परिवार की ज़रूरतों में दब गया, तब न्याय माँगने माँ खुद अदालत पहुँच गईं।
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
बोर्ड पर लिखा था —
“श्रीमती शारदा मेहता बनाम राज्य सरकार — इच्छा मृत्यु संबंधी याचिका।”
पत्रकारों ने सवालों की झड़ी लगा दी —
“मैडम, आप मरना क्यों चाहती हैं?”
शारदा ने शांति से उत्तर दिया,
“जब जीना दूसरों के लिए बोझ बन जाए, तो मरने की अनुमति भी इज़्ज़त लगती है।”
उनके वकील अमित शुक्ला ने अदालत में कहा —
“माननीय न्यायालय, मेरी मुवक्किल एक ईमानदार अफसर की पत्नी हैं। लेकिन उनके बेटों ने उनकी पेंशन का शोषण किया। अब वह आर्थिक और मानसिक दोनों रूप से टूट चुकी हैं।”
जज ने सख़्त स्वर में कहा,
“राहुल और सुमित, क्या यह सच है?”
राहुल बोला,
“सर, हमने कभी माँ से कुछ छीना नहीं, सिर्फ उनकी मदद ली।”
सुमित झिझकते हुए बोला,
“हमारा इरादा गलत नहीं था, बस हालात ऐसे थे।”
जज ने कहा,
“माँ की पेंशन मदद नहीं, उनका अधिकार है। आपने हक़ को एहसान बना दिया।”
उस दिन मीडिया की हेडलाइन बनी —
“जब माँ पहुँची अदालत: इच्छा मृत्यु नहीं, सम्मान की याचिका।”
सज़ा या सबक़
अगली सुनवाई के दिन कोर्ट खचाखच भरा था।
हर सीट पर कोई न कोई भावुक चेहरा बैठा था — कोई अपनी माँ को याद कर रहा था, कोई अपनी गलती।
जज साहब ने अपनी फाइल खोली और धीमे स्वर में कहा,
“माँ के आँसू, अदालत के सबूतों से कहीं ज़्यादा सच्चे होते हैं। आज हमें फैसला नहीं, एक सबक़ देना है।”
उन्होंने शारदा देवी की ओर देखा,
“शारदा देवी, आप क्या चाहती हैं?”
क्रमश: