“जब इंसान चुप हो जाए, तब कुत्ते की नाक सच बोलती है।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
इंदौर की शांति विहार कॉलोनी अपने नाम के बिल्कुल अनुरूप थी—शांत, सधी हुई, जैसे हर सुबह वही जानी-पहचानी दिनचर्या ओढ़कर जागती हो। लेकिन उस सुबह… कुछ टूटा-टूटा सा था।
हवा में एक अजीब सी बेचैनी घुली हुई थी।
मुख्य गेट के बाहर लोगों की भीड़ जमा थी। कोई धीमे-धीमे फुसफुसा रहा था, कोई मोबाइल पर फोटो खींच रहा था। कॉलोनी में पहली बार पुलिस की गाड़ी खड़ी थी। सायरन नहीं बज रहा था, फिर भी उसकी मौजूदगी सबके दिलों पर हथौड़े की तरह पड़ रही थी।
और उसी गेट के पास…
एक गोल्डन रिट्रीवर लगातार भौंक रहा था।
यह सामान्य भौंक नहीं थी।
न डर की।
न आक्रोश की।
यह भौंक किसी अनकहे अन्याय के खिलाफ़ थी—जैसे वह कहना चाहता हो, “कुछ गलत हुआ है… और मैं जानता हूँ।”
घर के भीतर, ड्रॉइंग रूम में कालीन पर एक शरीर निश्चल पड़ा था।
नाम था—अद्वैत शुक्ला।
अद्वैत… वह आदमी जिसे देखकर कोई भी यह सोच ही नहीं सकता था कि उसका कोई दुश्मन हो सकता है। शांत स्वभाव, सौम्य चेहरा, आँखों में अजीब सी नरमी। मोहल्ले के हर कुत्ते को नाम से बुलाने वाला, गली की हर बिल्ली के लिए दूध रख देने वाला इंसान।
माँ सुधा शुक्ला की मृत्यु के बाद वह और भी अकेला हो गया था। उस खालीपन को उसने जानवरों के साथ भरना शुरू किया।
“जानवर सवाल नहीं पूछते,”
वह अक्सर कहता,
“बस साथ देते हैं।”
छह महीने पहले, जब वह एक गोल्डन रिट्रीवर पिल्ला घर लाया था, तो पूरा मोहल्ला जान गया था। मिठाइयाँ बंटी थीं। बच्चे खुश थे।
अद्वैत की आँखों में चमक थी।
“आज से ये सिर्फ कुत्ता नहीं है,”
उसने पिल्ले को सीने से लगाकर कहा था,
“ये मेरा परिवार है।”
उसका नाम रखा गया—सनी।
गोल्डन रिट्रीवर स्वभाव से बेहद स्नेही होते हैं। वे अपने इंसान के भावों को पढ़ लेते हैं। सनी भी वैसा ही था—लेकिन कुछ ज़्यादा ही संवेदनशील।
उसकी आँखों में सिर्फ चमक नहीं, समझ थी।
और उसकी नाक…
जैसे हर गंध को पहचान नहीं, महसूस करती हो।
सुबह की सैर में वह अकसर अचानक रुक जाता। ज़मीन सूँघता, हवा में नाक उठाता, फिर अद्वैत की ओर देखता—
मानो पूछ रहा हो,
“सब ठीक है ना?”
अद्वैत हँस देता और उसके सिर पर हाथ फेर देता।
माँ की वसीयत खुली, तो एक और सच सामने आया।
एक पुराने संदूक में छुपा हुआ—एक दुर्लभ नीला हीरा।
अद्वैत ने उसे किसी को नहीं दिखाया।
बस इतना कहा था—
“माँ ने इसे ज़िंदगी भर संभालकर रखा… मैं भी रखूँगा।”
यही वाक्य उसकी सबसे बड़ी भूल बन गया।
रघुवीर चौहान—कॉलोनी का वही व्यक्ति, जो हर बात में ज़रूरत से ज़्यादा दिलचस्पी लेता था। दिखने में शरीफ, बोलने में मीठा, लेकिन आँखों में छिपा लालच साफ़ झलकता था।
हीरे की खबर उसके लिए नींद हराम करने वाली बन गई।
जिस रात अद्वैत मरा, वह रात सामान्य लगनी चाहिए थी।
लेकिन सनी जानता था—यह सामान्य नहीं है।
घर में कोई तोड़फोड़ नहीं थी।
मेज़ पर नींद की गोलियाँ।
पास में पानी का गिलास।
और एक सुसाइड नोट…
(क्रमश:)