कविता की हर पंक्ति में जीवन का संदेश, जागरूकता और आशा का प्रकाश
पंकज शर्मा “तरुण “, पिपलिया मंडी, जिला मंदसौर (म.प्र.)
सारांश:
यह कविताएँ जीवन, समाज और प्रकृति से जुड़े गहरे संदेश देती हैं। इनमें स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, मनोबल, प्रेम, आशा और सामाजिक कुरीतियों पर व्यंग्य का सुंदर मिश्रण है। हर रचना पाठक को सोचने, जागरूक होने और सकारात्मक परिवर्तन की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। आइए, इन्हें पढ़ें पूरे मनोयोग से—
स्वच्छ देश अपना बने (दोहा छंद)
पानी पी कर बोतलें, मत सड़कों पर फेंक।
स्वच्छ देश अपना बने, काम करो यह नेक।।
जब निकलें बाजार को,रखना थैला साथ।
पॉलीथिन से चौक हो, नाले बनते पाथ।।
पॉलीथिन युग का बड़ा,सिद्ध हुआ अभिशाप।
विकसित शहरी बाढ़ में, करते बहुत विलाप।।
बादल फटते जा रहे,कैसा हुआ प्रकोप।
गलती करता है मनुज,भगवन पर आरोप।।
गति अंकुश खोने लगी,बढ़ता दिखे जुनून।
राज मार्ग पर फैलता,युवा वर्ग का खून।।
हेलमेट सिर पर नहीं,लगा रहा इंसान।
दुर्घटना में दे रहा, जान बूझ कर जान।।
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दीपक चलो जलाते हैं (गीत)
अंधेरे का राज हुआ है, दीपक चलो जलाते हैं।
बाग पुराने उजड़े- उजड़े,नए पुष्प खिलाते हैं।।
शोर सियारों का बस्ती में, सरे शाम ही है आता।
मुर्गा कटने के डर से अब, बांग नहीं है दे पाता।।
गौरैया बुलबुल को अब तो,सर्प बहुत सताते हैं।
अंधेरे का राज….
इंसानों में पनप रहे हैं,अब गुण मच्छर खटमल के।
लख चौरासी से भय टूटा,पुण्य कमाता है छल से।।
जन्म नहीं लेते अब इंसा,चीर फाड़ से आते हैं।
अंधेरे का राज….
हनीमून से युवक डरे कुछ, नारी आदम खोर हुई।
मैं सब को यह दोष न देता,सब की सब ही चोर हुई।।
कभी देवियों सम पूजित थी, पालक खुद नचवाते हैं।
अंधेरे का राज हुआ है,दीपक चलो जलाते हैं।
बाग पुराने उजड़े- उजड़े,नए पुष्प खिलाते हैं।।
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मन (दोहाछंद)
कभी सफल होते नहीं,जो मन से कमजोर।
रीते बर्तन ज्यों करें, प्रति पल केवल शोर।।
पुष्ट मनोबल से मिले, विजय और सम्मान।
जप – तप पूजा साधना,देते यह वरदान।।
पुष्ट शक्ति संकल्प से,पाया ध्रुव वरदान।
बने सितारा भोर का,करता नमन जहान।।
मंजिल मिलती है उसे,जिनके मन विश्वास।
संकल्पों की शक्ति से,पतझड़ हो मधुमास।।
पहुँचा मंगल-चांद पर,संकल्पित इंसान।
अब जग भी कहने लगा,जय जय जय विज्ञान।।
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अति वर्षा (रोला छंद)
अति वर्षा की मार,झेलता उत्तर सारा।
टूटी पुलिया राह,उजड़ते हैं घर द्वारा।।
कैसा प्रलय प्रचंड, हुए बेघर नर नारी –
अति दोहन ने आज,हमें है मारा भारी।।
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लाल गुलाब (कुंडलिया)
सुंदर लाल गुलाब दे, जीवन की मुस्कान।
सुबह सवेरे खिल करे, रवि को दे सम्मान।।
रवि को दे सम्मान, पवन को महका देते।
हो जो मनुज उदास,उदासी सब हर लेते।।
सुनो तरुण की बात,सुखों का पुष्प समुंदर।
खिले खार की सेज, लगे है फिर भी सुन्दर।।
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आस (दोहा मुक्तक)
आस कभी मत कीजिए,बो कर पेड़ बबूल।
यह देते हर हाल में, पैने – पैने शूल।।
पेड़ लगा तू आम के,देंगे फल उपहार –
कंटक धारी पेड़ का, कर दे नष्ट समूल।।
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प्रेम का रोग (कुंडलिया)
आहें भरते रो रहे, बिछड़े प्रिय से लोग।
है इलाज मिलता नहीं , लगा प्रेम का रोग।।
लगा प्रेम का रोग,वजन भी प्रतिदिन घटता।
बिसरे सारे काज, नाम प्रियवर का रटता।।
कहे तरुण कविराय,पकड़ लो प्रभु की राहें।
तभी थमेगी यार, रोग की ठंडी आहें।।
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सपना (कुंडलिया)
सपना सच होगा तभी,जब त्यागोगे नींद।
तभी मने दीपावली, तभी मनेगी ईद।।
तभी मनेगी ईद, बंद कर आलस,सोना।
खुशी न जाए छूट,वरन पड़ जाए रोना।।
सुनो तरुण की बात,बहुत पड़ता है तपना।
तब ही होता पूर्ण, देखते हो जो सपना।।
One Comment
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बेहद खूबसूरत पंक्तियां।