प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
“उपचार कुदरत से !”
सारांश:
एक हादसे के बाद टूट चुके रवि को प्रकृति ने फिर से जीना सिखाया। नदी, खेत और मौसम कैसे बने उसकी सबसे बड़ी दवा – अब विस्तार से पढ़िए दिल छू लेने वाली कहानी का आखिरी चैप्टर –
सीमा – “याद है ना? यही है वो दवा, जो तुम्हें भीतर से ठीक करेगी।”
वे नदी किनारे पहुँचे।
पानी धूप में चमक रहा था, जैसे चाँदी के सिक्के तैर रहे हों।
पास में बच्चे कागज़ की नाव बहा रहे थे,
दूर चरवाहा अपनी भेड़ों को पुकार रहा था – “ओ मोती… ओ काली!”
रवि – “मैडम, यहाँ बैठते ही मन हल्का क्यों हो गया?”
सीमा – “क्योंकि ये हमें हमारी असली जगह पर लौटा देता है। हम धरती के बच्चे हैं, और जब हम उससे दूर हो जाते हैं, तो भीतर सूखने लगते हैं।”
गर्मी – धूप की तपिश, शाम की ठंडक
दिन बीतते गए।
वसंत की नरमी अब गर्मी की चुभन में बदल रही थी।
लेकिन रवि हर सुबह जल्दी आ जाता, ताकि दोपहर की तीखी धूप से पहले लौट सके।
एक दिन वह आम के पेड़ों के नीचे बैठा था।
पेड़ों में बौर आ गए थे, और हवा में उनकी मीठी महक फैली थी।
गाँव के बुज़ुर्ग रघुनाथ काका आकर बोले –
“बेटा, ये बौर आने का मतलब है कि आम जल्द ही आएंगे। तब तक तुम चलने लगोगे।”
रवि हंस पड़ा, लेकिन दिल में पहली बार भरोसा-सा जगने लगा।
बरसात – मिट्टी की खुशबू, जीवन की बूँदें
जून के आखिरी हफ्ते में पहली बारिश हुई।
बादलों की गड़गड़ाहट, मिट्टी की भीनी महक, और नदी का उफान।
रवि अब बैसाखी के सहारे कुछ कदम चल लेता था।
बरसात में नदी किनारे बैठना उसे बहुत भाता।
बच्चे भीगते, मछलियाँ पकड़ते, और पेड़ों की पत्तियाँ गहरी हरी हो जातीं।
रवि – “मैडम, मुझे लगता है कि बारिश मेरे अंदर भी हो रही है… जैसे पुराना सारा धूल-धुआँ धुल गया हो।”
सीमा – “यही तो चाहती थी मैं।”
सर्दी – कोहरे में भी उजाला
अक्टूबर के बाद सर्दी आ गई।
सुबह-सुबह कोहरा खेतों को ढक लेता, और नदी धुंध में खो जाती।
अब रवि बिना सहारे के वहाँ तक पहुँचने लगा था।
सर्दी की सुबह, हाथ में चाय का कुल्हड़, सामने धूप सेंकते किसान, और बगल में बैठी सीमा मैडम।
रवि – “अगर मैं यहाँ नहीं आता, तो शायद कभी ठीक नहीं हो पाता।”
सीमा – “ठीक तो तुम खुद हुए हो, रवि। मैंने बस तुम्हें वहाँ ला दिया, जहाँ प्रकृति तुम्हें गले लगा सके।”
ठीक होने का दिन
एक साल पूरा हुआ।
उस दिन रवि बिना सहारे के नदी किनारे पहुँचा।
पानी में झुककर उसने हथेली भर पानी उठाया और महसूस किया – यह वही नदी है, जिसने उसे फिर से जीना सिखाया।
रवि – “मैंने सीखा है कि इंसान सिर्फ दवा से नहीं, जीने की वजह से ठीक होता है। प्रकृति ने मुझे वो वजह दी।”
सीमा – “याद रखना, जब भी मन टूटे… धरती माँ के पास लौट आना।”
रवि ने आसमान की ओर देखा।
बादलों के बीच से सूरज की किरणें उस पर बिखर रही थीं,
जैसे कह रही हों – “तुम फिर से जीने के लिए तैयार हो।”
उसने मन में ठान लिया –
अब चाहे ज़िंदगी कितनी भी व्यस्त हो,
हर मौसम में वह इस नदी, इन खेतों और इस आसमान से मिलने जरूर आएगा।
(काल्पनिक रचना)