प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
“उपचार कुदरत से !”
सारांश:
एक हादसे के बाद टूट चुके रवि को प्रकृति ने फिर से जीना सिखाया। नदी, खेत और मौसम कैसे बने उसकी सबसे बड़ी दवा – अब विस्तार से पढ़िए दिल छू लेने वाली कहानी-
भोपाल से कुछ दूर, सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच बसा छोटा-सा गाँव बड़वानी।
सुबह की ओस पत्तियों पर मोतियों की तरह चमक रही थी, सरसों के फूल हवा में लहरा रहे थे, और दूर किसी आम के पेड़ पर बैठी कोयल कूक रही थी।
दुनिया इस वक्त एक कविता जैसी थी — लेकिन यह कविता, सरकारी अस्पताल की सफ़ेद दीवारों के भीतर आकर बेमानी हो जाती थी।
कमरा नंबर सात।
लोहे की खाट पर लेटा था रवि — तीस बरस का, पर चेहरे पर थकान और उदासी की मोटी परत।
छह महीने पहले सड़क हादसे में बायीं टांग बुरी तरह घायल हुई थी।
ऑपरेशन के बाद डॉक्टरों ने कह दिया था — “ठीक होने में वक्त लगेगा, धैर्य रखना होगा।”
पर वक्त जितना बीतता, धैर्य उतना ही टूटता गया।
दवा और पट्टियों से उसका घाव भर रहा था, पर भीतर का खालीपन… और गहरा हो रहा था।
सुबह नर्स आती, दवा देती, डॉक्टर चेकअप करते, फिर लंबी खामोशी।
खिड़की से दिखता बस अस्पताल का आंगन और पार जाती सड़क।
गंध थी दवाइयों की, आवाज़ थी मशीनों की, और चारों तरफ चेहरे थे दर्द से भरे।
एक सुबह, ड्यूटी डॉक्टर सीमा उसकी फाइल देखते-देखते रुकीं।
करीब चालीस की उम्र, शांत पर दृढ़ नज़रें, और आवाज़ में एक आत्मीयता।
उन्होंने महसूस किया कि रवि का शरीर ठीक हो रहा है, पर आत्मा जैसे बुझ चुकी है।
सीमा – “रवि, क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा दर्द सिर्फ टांग में है?”
रवि (थोड़ी देर चुप रहकर) – “अब तो लगता है कि पूरा मैं ही दर्द हूँ, मैडम… अंदर से भी, बाहर से भी।”
सीमा – “कभी प्रकृति के बीच गए हो, जब से हादसा हुआ?”
रवि – “नहीं… यहाँ से बाहर तो मैं आया ही नहीं।”
सीमा – “तो कल चलते हैं बाहर। नदी किनारे, खेतों में। व्हीलचेयर पर सही, पर चलेंगे।”
रवि – “और उससे क्या होगा?”
सीमा (हल्की मुस्कान के साथ) – “शरीर को दवा चाहिए, लेकिन मन को हवा, धूप और मिट्टी की खुशबू चाहिए।”
पहली सुबह – वसंत की महक
अगले दिन वार्ड बॉय गोपाल ने रवि को व्हीलचेयर में बिठाया।
जैसे ही अस्पताल का गेट पार किया, रवि की आंखें फैल गईं —
सामने खुला, नीला, बेदाग आसमान था।
महीनों बाद उसने इतना साफ आकाश देखा था।
धूप मुलायम थी, हवा में खेतों की मिट्टी और गेहूं की बालियों की गंध।
पगडंडी के दोनों ओर सरसों के फूल हवा में झूम रहे थे।
खेतों में काम करती औरतों के रंग-बिरंगे दुपट्टे जैसे ज़मीन पर बिखरे इंद्रधनुष हों।
रवि (गहरी सांस लेकर) – “ये खुशबू… ये तो बचपन जैसी है।”
सीमा – “याद है ना? यही है वो दवा, जो तुम्हें भीतर से ठीक करेगी।”
क्रमश:
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कुदरत से बड़ा कोई डॉक्टर नहीं।