प्रस्तुति : शिखा तैलंग, भोपाल
“अर्जुन!” सिमरन ने उसे झकझोरा। “क्या हो गया तुझे? तू ठीक है?”
अर्जुन ने अधमुंदी आंखों से उसे देखा और बड़बड़ाया, “तू क्यों आई? तेरे जैसी अच्छी लड़कियों को मेरे जैसे लड़कों से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहिए।”
“तू मेरा दोस्त है, अर्जुन। और अगर तू खुद को बर्बाद कर रहा है, तो मैं चुप नहीं रह सकती।”
अर्जुन की आवाज़ में कड़वाहट थी, “मेरे पास कोई भविष्य नहीं है, सिमरन। सिर्फ दर्द है।”
“हर दर्द का इलाज होता है, अर्जुन। लेकिन पहले मन बनाना पड़ता है। मैं तेरे साथ हूँ।”
उस रात सिमरन ने पहली बार किसी दोस्त के लिए इतनी बेचैनी महसूस की। लेकिन ज़िंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई उसी रात सामने आई — जब अर्जुन नशे की हालत में बाइक चला रहा था और पेड़ से टकरा गया। अस्पताल की सफेद दीवारों के बीच, ICU के बाहर बैठी सिमरन की आंखों से आंसू रुक नहीं रहे थे।
बीजी – अर्जुन की स्नेही दादी – ने उसका सिर सहलाया, “पुत्तर, रब का शुक्र है कि वो बच गया। लेकिन अब उसे बदलना ही होगा।”
“मैं उसके साथ हर कदम पर हूँ, बीजी। मैं साथ छोड़ने वाली नहीं हूँ।” सिमरन की आवाज़ में दृढ़ निश्चय था।
अर्जुन अब रिहैब सेंटर में था। हर दिन एक जंग थी – खुद से, अपनी लत से, और अपने अतीत से। लेकिन अब वह अकेला नहीं था। सिमरन उसके साथ थी। हर हौसले की तरह वह उसकी उम्मीद बन गई थी।
धीरे-धीरे अर्जुन के हाथों में फिर से कला ने जन्म लिया। उसने पेंटिंग करनी शुरू की – वही भावनाएँ जो शब्दों में नहीं कह पाता था, अब रंगों में ढलने लगी थीं। उसकी पहली पेंटिंग थी – एक टूटे हुए दिल के बीच से उगता हुआ सूरज।
“तेरे साथ रहकर समझा कि ज़िंदगी सिर्फ दर्द नहीं होती, उम्मीद भी होती है,” अर्जुन ने एक दिन सिमरन से कहा।
“तूने सिर्फ नशा नहीं छोड़ा, अर्जुन। तूने नई ज़िंदगी शुरू की है,” सिमरन मुस्कराई।
और फिर आया कॉलेज का ग्रैजुएशन डे। दोनों हाथ में डिग्री लिए खड़े थे – एक नई शुरुआत का प्रतीक। अर्जुन अब उन छात्रों का मार्गदर्शन करता था जो नशे की लत से जूझ रहे थे। वह प्रोफेसर सूरी के साथ मिलकर एक काउंसलिंग ग्रुप चला रहा था।
“मुझे तुम पर गर्व है, अर्जुन। तुमने अपने दर्द को मकसद में बदल दिया,” प्रोफेसर सूरी ने कहा।
अर्जुन ने सिमरन की ओर देखा और मुस्कराया, “सिमरन ने रास्ता दिखाया था… मैं बस चलता गया।”
“अब चलता रह,” सिमरन ने मुस्कराकर कहा, “पर मैं साथ चलूँगी!”
अर्जुन हँस पड़ा। सिमरन ने उसके बालों में एक छोटा सा फूल लगा दिया – उनका प्यारा सा मज़ाक, जो अब एक आदत बन चुका था।
सिमरन की आवाज़ धीमे-धीमे सुनाई दी – एक आख़िरी भावुक पंक्ति में:
“ज़िंदगी में गलतियाँ सब करते हैं। लेकिन अगर साथ सही हो, तो रास्ता भी मिल जाता है और मंज़िल भी।”
(काल्पनिक कहानी)
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I was right. It has an uplifting ending.