प्रस्तुति : शिखा तैलंग, भोपाल
लुधियाना के एक कॉलेज कैंपस में, पतझड़ के मौसम की हल्की धूप में सिमरन अपनी किताबों में खोई बैठी थी। अमृतसर से आई यह होशियार और महत्वाकांक्षी लड़की मनोविज्ञान की पढ़ाई कर रही थी, और पढ़ाई के प्रति उसकी गंभीरता चेहरे पर साफ झलक रही थी। तभी अचानक एक क्रिकेट बॉल उसके पास आकर गिरी। वह चौंकी, और अगले ही पल एक लड़का हड़बड़ाता हुआ बॉल लेने दौड़ा आया।
“ओये होये! तू तो मेरी बॉल ही ले गई!” – मुस्कराते हुए उस लड़के ने कहा।
सिमरन ने भी मुस्कराते हुए बॉल उसकी ओर बढ़ाई, “तेरी बॉल का मैं क्या करूँ? बस देख रही थी कि कॉलेज में क्रिकेट भी इतनी सीरियसली खेली जाती है।”
“अच्छा जी, आपको क्रिकेट पसंद नहीं?” लड़का थोड़ा झिझकते हुए बोला।
“पसंद है,” सिमरन बोली, “लेकिन ज़िंदगी में और भी ज़रूरी चीज़ें हैं।”
“ओ हो, साइकोलॉजिस्ट सिमरन जी!” लड़का हँस पड़ा।
दोनों की हँसी धीरे-धीरे एक नई दोस्ती की बुनियाद रख रही थी। वह लड़का था अर्जुन सिंह – लुधियाना का एक बेफिक्र सा दिखने वाला लड़का, पर अंदर ही अंदर नशे की लत से जूझता हुआ। बाहर से मस्ती और हँसी, लेकिन भीतर कोई गहरा खालीपन।
सिमरन को अर्जुन का अंदाज़ दिलचस्प लगा। बातों-बातों में दोनों की मुलाकातें बढ़ने लगीं, लाइब्रेरी में, कैंटीन में, या फिर यूँ ही कैंपस के बेंचों पर बैठे हुए – ज़िंदगी की बातें, सपनों की उड़ानें और कभी-कभी चुप्पियों में छुपी बेचैनियाँ।
पर अर्जुन की असलियत कॉलेज के उन दोस्तों को भी नहीं पता थी, जो उसे दिनभर हँसते हुए देखते थे। जब शाम ढलती, तो वह अपने कमरे के अंधेरे में गुम हो जाता। दीवारों पर लगी अपने माता-पिता की पुरानी तस्वीरें उसे घूरतीं – वही माता-पिता जो एक सड़क दुर्घटना में अचानक उससे छिन गए थे। उनके जाने के बाद अर्जुन का मन किसी सहारे को तरसने लगा, और उस खालीपन को भरने के लिए उसने नशे का रास्ता चुन लिया।
एक दिन सिमरन गलती से बॉयज़ कॉमन रूम में चली गई। वहां उसे अर्जुन बेहोश पड़ा मिला। उसके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था, और उसकी आंखों के नीचे गहरे काले घेरे – जैसे किसी कहानी के गवाह हों।
“अर्जुन!” सिमरन ने उसे झकझोरा। “क्या हो गया तुझे? तू ठीक है?”
क्रमश:
(काल्पनिक कहानी)
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Navi raah, I think this will have a positive ending