प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
“जिन्होंने सिखाया कि देशभक्ति का मतलब सिर्फ़ शब्द नहीं, कर्म है।”
सारांश :
फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की कहानी साहस, रणनीति और नेतृत्व की मिसाल है।
1934 से 1971 तक, उन्होंने युद्ध के मैदान से लेकर प्रधानमंत्री के सामने तक अपने फैसलों से भारत की जीत तय की।
उनकी विरासत आज भी हर भारतीय सैनिक के दिल में जोश और आत्मविश्वास जगाती है। आइए उनकी जीवनी और योगदान के बारे में जानें विस्तार से—
1934 की एक ठंडी सर्द सुबह।
अमृतसर के पुराने मोहल्ले में धुंध फैली हुई थी।
गली के मोड़ पर दूधवाले की “दूध लो… ताज़ा दूध” की आवाज़ और कहीं दूर मंदिर की घंटियों की झंकार सुनाई दे रही थी।
डॉ. होरमूज मानेकशॉ के आँगन में उनका बेटा सैम, लंबा-चौड़ा, चौड़ी छाती वाला नौजवान, हाथ में इंडियन मिलिट्री एकेडमी का फ़ॉर्म पकड़े खड़ा था।
आँखों में चमक और चेहरे पर वही मुस्कान, जो बाद में उसकी पहचान बनी।
पिता – “सैम, तुम पढ़ाई में अच्छे हो, डॉक्टर बन सकते हो। सेना में क्यों जाना चाहते हो? वहाँ तो मौत सामने खड़ी होती है।”
सैम – (आँखों में दृढ़ता) “पापा, मौत से डरकर जीना भी क्या जीना? डॉक्टर बनकर मैं एक-एक इंसान की जान बचाऊँगा… पर सिपाही बनकर, मैं पूरे देश की जान बचा सकता हूँ।”
माँ ने चुपचाप बेटे का हाथ थामा, उसकी हथेली सहलाई, और धीरे से कहा –
माँ – “जा बेटा, तेरा रास्ता तेरा है। हम तुझ पर गर्व करेंगे, चाहे तू लौटकर आए… या तिरंगे में लिपटा।”
देहरादून की पहली परीक्षा
इंडियन मिलिट्री एकेडमी, देहरादून।
हरी-भरी पहाड़ियाँ, खुला आसमान, और परेड ग्राउंड पर कैडेट्स की कतारें।
पहले ही दिन सैम ने महसूस किया – यहाँ सिर्फ़ शरीर नहीं, दिमाग और आत्मा की भी परीक्षा होती है।
कुछ साथी कैडेट्स फुसफुसाते –
“अरे, ये पारसी लड़का क्या लड़ेगा? देखना, पहली ट्रेनिंग में ही गिर जाएगा।”
लेकिन पहले हफ़्ते की कठिन ड्रिल में, जब सब थककर बैठ गए, सैम अब भी दौड़ रहा था।
एक दिन इंस्ट्रक्टर ने पूछा –
इंस्ट्रक्टर – “कौन है जो बर्फ़ीली नदी में कूदकर दूसरी तरफ़ रस्सी बाँध सकता है?”
चारों ओर सन्नाटा।
सैम ने एक कदम आगे बढ़ाया –
सैम – “मैं करूँगा, सर!”
ठंडे पानी में कूदते ही उसकी साँस थमने लगी, लेकिन आँखों में एक ही बात थी – “पीछे नहीं हटना।”
वो बाहर निकला, पूरा भीगा हुआ, और रस्सी कसकर बाँधी।
उस दिन से पूरी बैच ने मान लिया – ये लड़का हार नहीं मानता।
बर्मा का रण और सात गोलियाँ
1942।
द्वितीय विश्व युद्ध की आग एशिया तक पहुँच चुकी थी।
सैम की बटालियन – 4थ बटालियन, 12 फ़्रंटियर फ़ोर्स राइफल्स – बर्मा के घने जंगलों में जापानी सेना से लड़ रही थी।
बरसात में कीचड़, पेड़ों के बीच दुश्मन की घात, और चारों ओर गोलियों की आवाज़।
अचानक दुश्मन ने हमला किया।
सैम ने अपनी टुकड़ी को पीछे हटने का आदेश दिया, खुद आगे बढ़कर कवर फ़ायर दिया।
तभी एक के बाद एक सात गोलियाँ उसके पेट और सीने में धँस गईं।
ब्रिटिश अफ़सर झुककर बोले –
अफ़सर – “यंग मैन, तुम शायद बचोगे नहीं… आख़िरी इच्छा?”
क्रमश:
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Thank you for this story of a braveheart Indian.