प्रस्तुति : शिखा तैलंग, भोपाल
जहां श्रद्धा हो सच्ची, वहीं शिव-पार्वती की कृपा बरसती है।
सावन के पवित्र महीने में गौरी ने मैया गौरा से शिव-पार्वती के प्रेम और भक्ति का अर्थ सीखा, जिसमें उपवास से ज़्यादा आत्मसमर्पण और सेवा की भावना होती है। गौरी ने सच्चे मन से व्रत किया, गरीबों की सेवा की और अपने चरित्र को निखारा, जिससे उसकी प्रार्थना में सच्चाई झलकी। समय बीता और उसकी भक्ति का फल उसे एक संवेदनशील, सेवा-निष्ठ डॉक्टर जीवनसाथी के रूप में मिला—सच्चे प्रेम और समर्पण की जीत हुई।आइए श्रद्धा, भक्ति और प्रेम से भरी यह स्टोरी पढ़ें विस्तार से—
सावन का महीना शुरू होने वाला था। चारों ओर हरियाली, ठंडी फुहारें और वातावरण में “बोल बम” की गूंज सुनाई दे रही थी। गाँव की गलियों में महिलाएँ हर सोमवार को शिव मंदिर जातीं, व्रत रखतीं और भगवान शिव से अच्छा पति पाने की कामना करतीं।
पर इस बार कुछ अलग था…
एक छोटी सी पहाड़ी पर बसे गाँव अमरपुर में एक बुजुर्ग औरत मैया गौरा अपने झोपड़े में बैठी रोज़ शाम को भगवान शिव और पार्वती की आरती करती। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक होती, मानो वो भगवान से सीधे बात करती हों।
एक दिन उनकी पड़ोस की लड़की गौरी, जो मात्र 18 वर्ष की थी, आकर बोली—
“मैया, सब लड़कियाँ सावन में व्रत रख रही हैं। क्या व्रत रखने से सचमुच शिवजी जैसा पति मिलता है?”
मैया मुस्कुराईं, उनकी झुर्रियों में जीवन का गहरा अनुभव था।
“बिलकुल बेटी। पर व्रत सिर्फ खाने-पीने की चीज़ों को छोड़ने से नहीं होता। सच्चा व्रत तो दिल से होता है। शिवजी को छल कपट नहीं चाहिए, उन्हें चाहिए सच्ची श्रद्धा और प्रेम।”
“पर शिवजी ने माँ पार्वती को क्यों अपनाया? माँ तो राजकुमारी थीं, और शिवजी तो एक अघोरी साधु।”
मैया ने चिमटे से अंगीठी में लकड़ी समेटते हुए कहा—
“बस यही तो बात है। प्रेम में समानता नहीं देखी जाती। शिव जी ने पार्वती के तप को देखा, उनका समर्पण देखा।”
कथा चलती है…
स्वर्गलोक।
माता पार्वती हिमालय की पुत्री थीं। लेकिन उनका मन बचपन से ही शिव में रमा हुआ था। किशोरावस्था में उन्होंने जब यह सुना कि शिवजी योगी हैं, ध्यानस्थ हैं, और विवाह में रुचि नहीं रखते—तो उन्होंने अपने भीतर दृढ़ संकल्प ले लिया।
“मुझे वही चाहिए जो सच्चा हो, सरल हो, और प्रेम को समझे। मुझे शिव चाहिए, और कोई नहीं।”
पार्वती बोलीं।
हिमवान ने चिंता से कहा—”बेटी, वो कोई साधारण व्यक्ति नहीं। वह संहारक हैं, एक तपस्वी हैं, उनका जीवन जंगलों में बीतता है।”
पार्वती ने धीमे स्वर में उत्तर दिया—
“बाबा, वे तपस्वी हैं पर अहंकारी नहीं। वे संहारक हैं पर प्रेम करने में सबसे सरल हैं।”
और फिर पार्वती वन में चली गईं तप करने।
क्रमश:
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मन मेरा मंदिर शिव मेरी पूजा