“सोशल मीडिया की मोहब्बत हमेशा वैसी नहीं होती जैसी दिखती है!”
विजय कुमार तैलंग, जयपुर
सारांश:
एक युवक अपने सपनों की लड़की से मिलने जा रहा है, लेकिन सामने बैठी अधेड़ महिला उसे उलझनों के जाल में फंसा देती है। क्या सचमुच वह महिला भविष्य देख सकती है? या फिर यह सब उसकी प्रेमिका कृतिका का बड़ा खेल है? सच सामने आते ही उसकी दुनिया हिल जाती है। ऐसा क्यों और कैसे हुआ?आइए, जानें विस्तार से—
वह देर से खड़ा था ‘कृतिका’ की प्रतीक्षा में। उस दिन उसका कृतिका से पहला साक्षात्कार होने को था यानी उसके साथ डेट थी। ऑन लाइन चैटिंग तो काफी समय से चल रही थी। कृतिका के हुस्न ने उसे अपना दीवाना बना छोड़ा था। वह सत्ताईस वर्ष का था तो कृतिका पच्चीस की। उसकी प्रोफाइल फोटो में वह हीरोइनों को भी मात करती थी। उसने कृतिका से कई बार कहा था कि वी सी (वीडियो कॉंफ़्रेंसिंग) पर आओ पर कृतिका कभी राजी नहीं हुई। एक न एक बहाना बना दिया करती थी। बहुत ना नुकुर करने के बाद आज कृतिका उससे साक्षात मिलने को राजी हुई थी। उनका सिटी गार्डन में इसी शाम मिलना तय हुआ था।
बादल गड़गड़ाने लगे थे। बिजली भी रह रह कर चमक रही थी। वह यूँ तो पूरी तैयारी से आया था – सूट बूट भी एकदम नये चकाचक थे। चलने से पहले उसने दस बार आईना देखा होगा। जैसी उसने फेस बुक प्रोफाइल में अपनी फोटो अपलोड की हुई थी, ठीक उससे बीस ही लग रहा था। अक्सर लोग फेस बुक पर जैसे स्मार्ट नजर आते हैं वैसे होते नहीं। वे अपनी उम्र छुपाने के लिए प्रोफाइल पर डेट ऑफ बर्थ भी गलत डालते हैं और फोटो भी जवानी की डालते हैं चाहे वे वास्तविकता में अंकल जी ही क्यों न लगते हों, लेकिन उसके मामले में न कोई लुकाव था, न कोई छुपाव। वह जैसा था वैसी ही छवि उसने सोशल मीडिया में बनाई हुई थी। उसकी स्मार्टनेस देखकर कोई भी उसकी फ़ैन हो सकती थी। उसकी स्माइल भी ग़जब ढाती थी।
वह सिटी गार्डन के फव्वारे के पास ही खड़ा था और बिगड़ते हुए मौसम को कोस रहा था कि इसे आज ही बिगड़ना था। असल में उन्होंने मिलने का स्थान सिटी गार्डन ही चुना था। वह तो कृतिका को देखते ही पहचान लेगा क्योंकि वह है ही इतनी खूबसूरत। वैसे वह भी कोई कम नहीं था। देखने में हीरोज़ को मात करता था। मौसम को बिगड़ता देख और बूँदें पड़ती देख उसने कृतिका को मोबाइल से फोन किया, “मौसम बिगड़ रहा है ऐसे में गार्डन में खड़ा रहना मुमकिन नहीं, तुम कहाँ हो?”
उत्तर मिला, “मैं आ ही रही हूँ, समझ लो रास्ते में ही हूँ। वहाँ से कुछ दूरी पर ‘ल्हासा’ रेस्टोरेंट है, वहाँ पहुँचो, मैं वहीं आ रही हूँ।”
वह ल्हासा रेस्टोरेंट के हाल में प्रवेश कर गया। हाल में अच्छी खासी गहमागहमी थी। सभी टेबलों पर कस्टमर्स जमे हुए थे। न जाने उसे एक टेबल और साथ की दो कुर्सियां कैसे खाली मिल गई थी? वह वहीं बैठ गया।
“सर, ऑर्डर करें।” वेटर सामने खड़ा था। उसने होटल की मीनू उसे थमाते हुए कहा।
“थोड़ा ठहरो। मेरे साथ कोई है जो आने वाला है, तभी ऑर्डर करूँगा।”
ओ के कहकर वेटर चला गया।
वह बार बार घडी देख रहा था। पता नहीं कृतिका कहाँ अटक गई? अभी तक नहीं आई। पच्चीस मिनिट हो गए।
तभी एक अधेड़ महिला जिसकी उम्र अट्ठावन या साठ वर्ष की होगी, उसके सामने आई और मुस्कुराई। वह समझा नहीं तो महिला बोली – “क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ? “
क्रमश: