“ज़िंदगी सिर्फ खर्चों का हिसाब नहीं—एसेट्स, उम्मीद और परिवार के भरोसे से चलने वाली एक यात्रा है।”
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प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
…कुसुम ने कहा—
“मतलब जो चीज़ पैसे बनाने में मदद करे वही एसेट!”
“बिलकुल!”
2. लायबिलिटीज – यानी जीवन की आवश्यकताएँ
शैलेश ने दूसरा पन्ना खोला—
“अब आते हैं लायबिलिटीज (LIABILITIES) पर।
ये वो चीज़ें हैं जिन्हें पूरा करना हमारा कर्तव्य होता है।”
हर घर में ये ही चलते हैं :
- बच्चों की शिक्षा व ट्यूशन फीस
- बिजली, पानी, फोन, इंटरनेट के बिल
- किराया या घर की EMI
- राशन, दूध, सब्जी
- बुज़ुर्गों की दवा
- बच्चों की शादी
- त्योहारों के खर्च
- पत्नी को खुश रखना (कुसुम हँस पड़ी),
- और सबसे ज़रूरी—कर्ज़ चुकाना आदि।
कुसुम बोली—
“इन लायबिलिटीज ने तो इंसान को बिलकुल निचोड़ दिया है!”
शैलेश ने मुस्कुराते हुए कहा—
“पर ये भी जरूरी हैं, कुसुम।
यही हमारी जिम्मेदारियाँ बनाती हैं।”
अथर्व बोला—
“पापा, क्या लायबिलिटीज बुरी होती हैं?”
“नहीं बेटा!
लायबिलिटीज ही तो घर को चलाती हैं।
बस ध्यान इतना रखना है कि हमारी लायबिलिटीज हमारे एसेट्स से ज्यादा न हों।
वरना तनाव बढ़ता जाता है।”
3. रिस्क – यानी वह कदम जो डराता भी है और आगे बढ़ाता भी
तीसरा पन्ना खोलते हुए शैलेश बोला—
“अब आते हैं रिस्क (RISK) पर।
जहाँ जोखिम नहीं, वहाँ विकास नहीं।
लेकिन जोखिम समझदारी से लेना चाहिए।”
कुसुम बोली—
“जैसे क्या?”
“जैसे—
- नौकरी के लिए दूसरे शहर या विदेश जाना
- नए बिज़नेस में पैसा लगाना
- वाहन चलाना
- घर बनवाना
- शेयर मार्केट में निवेश
- या फिर लोन लेना, आदि।”
रीया बोली—
“मम्मी का मुंबई जाकर ब्यूटी पार्लर ट्रेनिंग करना भी तो जोखिम ही था!”
कुसुम मुस्कुराई—
“हाँ बेटा… डर तो लगा था। पर उससे मुझे आत्मविश्वास आया।”
शैलेश ने कहा—
“देखा? रिस्क से ही जीवन में आगे बढ़ने का रास्ता बनता है।”
अचानक लगी झटका – EMI और बीमारी का डबल अटैक
उसी हफ्ते शैलेश के पिता की तबीयत अचानक बिगड़ गई।
दवा, टेस्ट, डॉक्टर—सब मिलाकर लगभग 20,000 का अनुमान लगा।
उसी समय घर की EMI की तिथि भी पास थी।
घर में तनाव हो गया।
कुसुम बोली—
“देखा? यही तो लायबिलिटीज हैं!”
शैलेश ने सिर पकड़ लिया—
“मैं सोच रहा हूँ… कि मेरे एसेट्स इतने कम क्यों हैं कि एक बीमारी हमारे बजट को हिला देती है?”
कुसुम ने उसकी पीठ थपथपाई—
“डरो मत। हम संभाल लेंगे। और हाँ—शायद अब मुझे भी अपने एसेट्स बनाने चाहिए।”
यह सुनकर शैलेश ने उसकी ओर देखा—
“कुसुम, तुम सच में बिज़नेस शुरू करना चाहती हो?”
“हाँ। अब समय आ गया है।”
कुसुम का छोटा बिज़नेस – और जीवन का संतुलन
कुसुम ने घर पर ही घरेलू पापड़ और अचार का छोटा व्यापार शुरू किया।
पहले सिर्फ पड़ोस में बेचा, फिर व्हाट्सऐप ग्रुप बनाए, फिर ऑनलाइन पेज बनाया।
धीरे-धीरे ऑर्डर्स आने लगे।
उसकी पहली कमाई 1,650 रुपये थी।
वह नोट लेकर शैलेश के पास आई और बोली—
“ये रही मेरी पहला एसेट्स।”
शैलेश भावुक हो गया—
“हमारा नहीं… हम दोनों की पहली एसेट्स।”
दोनों की मुस्कान में एक अनोखी चमक थी।
बच्चे ताली बजाते हुए बोले—
“मम्मी सुपरवुमन!”
क्रमश: