वो दिन लौट आए तो ज़िंदगी फिर मुस्कुरा उठे — बचपन की मासूमियत में छिपा है सच्चा सुख।
सुनीता कुमारी (विज्ञान शिक्षिका), ,बेंगलुरू
सारांश :
यह कविता हमें उन सुनहरे दिनों की याद दिलाती है जब ज़िंदगी बेफ़िक्र, मासूम और खुशियों से भरी थी।
कवयित्री ने बचपन के हर छोटे पल—खेल, हँसी, और माँ की कहानी—को बड़ी भावनाओं से पिरोया है।
यह एक दिल को छू लेने वाली पुकार है — “कोई लौटा दे, मेरे बचपन के वो दिन!”आइए दिल को छूने वाली यह कविता पढ़ें विस्तार से—
वो बचपन भी कितना सुहाना था,
जिसका रोज़ एक फ़साना था,
जिसमें खुशियों का ख़ज़ाना था,
कोई लौटा दे,मेरे बचपन के वो दिन।
ना कुछ फिक्र था, बड़ी ही निडर थी,
जिधर चाहा, उधर घुमती थी।
न वर्तमान की फ़िक्र थी, न भविष्य की चिंता,
न सोने की चिंता, न उठने का भय था।
दिल तितलियों का दिवाना था,
बेफ़िक्र और हँसमुख था,
वो बचपन,भी कितना सुहाना था।
जिसका रोज़ एक फ़साना था,
जिसमें खुशियों का ख़ज़ाना था,
कोई लौटा दे,मेरे बचपन के वो दिन।
ना शिक्षक का डर था,
ना मनमानी का भय था,
ना कड़कती धूप में, पैर जलने का डर था,
ना बारिश में, भीगने का भय था,
घर के आँगन में ,सीढ़ी पर दौड़ लगाना,
झट से चढ़ना, झट कर उतर जाना,
हर वक्त खेलने की ,करते थे बात,
दोस्तों के संग गुड्डे-गुड़ियों का खेल,
हर बार नए खिलौने,
लेने की ज़िद किया करते थे ,
वो बचपन भी कितना सुहाना था।
जिसका रोज़ एक फ़साना था,
जिसमें खुशियों का ख़ज़ाना था,
कोई लौटा दे,मेरे बचपन के वो दिन।
क्या ठाठ थी,
खेल-खेल में मिठाई चट कर जाना,
बिना वजह हँस पड़ना,रो जाना,
खेल कर लौटते,
शाम को पसीने से तर-बतर,
मिट्टी से सने, हाथों से पोछ लेते,
चेहरा को,
सफाई से अनजान बचपन,
माँ को रोज कहानी सुनाने को जिद्द,
कहानी सुनते-सुनते सपनों में सो जाना।
वो बचपन भी कितना सुहाना था।
जिसका रोज़ एक फ़साना था,
जिसमें खुशियों का ख़ज़ाना था,
कोई लौटा दे,मेरे बचपन के वो दिन।
अगर किसी ने काश!
उन दिनों बता दिया होता,
थोड़ी और खुशियाँ,
अपनी झोली में बटोर लेती,
कोशिश करती, हवा की रूख मोड़ देती,
समय को थाम लेती, सपनों से जोड़ लेती।
बड़े होने से मुँह मोड़ लेती ,
वो बचपन भी कितना सुहाना था।
जिसका रोज़ एक फ़साना था,
जिसमें खुशियों का ख़ज़ाना था,
कोई लौटा दे,मेरे बचपन के वो दिन ।
उम्र थोड़ी थी, पर सपने बड़े थे,
सपनों के पीछे-पीछे भागते-भागते
न जाने दिन, महीने, साल कैसे निकल गए,
सपने पीछे रह गए, हम आगे निकल गए ,
वो दिन फिर से कोई लौटा दे।
जिसका रोज़ एक फ़साना था,
जिसमें खुशियों का ख़ज़ाना था,
कोई लौटा दे मेरे बचपन के वो दिन ।
“बचपन की यादें,वोअनमोल पल हैं,
जिनमें मासूमियत,
बेफिक्री और सच्चा सुख छिपा है।”
2 Comments
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It was written very nicely, I appreciate the feelings and emotions which has been associated with it behind. Not just it was expressive but was deeply connected with the soul
Bahut badhiya, ese hi likhte raho.