“कामयाबी वही, जो इंसान को ऊँचा उठाए—उसका ज़मीर न गिराए।”
आश हम्द, पटना( बिहार)
सियासत का पहला सबक
बशीर ने शहर जाने का फ़ैसला कर तो लिया था लेकिन अब उसको यह फ़िक्र सता रही थी कि वह चला गया तो उसकी बहनों का यहाँ ध्यान कौन रखेगा! उनको अकेला तो नहीं छोड़ सकता था। क्या करे, क्या ना करे की दुविधा में फंस गया था। तभी उसे उर्मिला बुआ याद आईं… जो उसके पड़ोस में बिल्कुल अकेली रहती थीं क्योंकि उनके सारे बच्चे शादी के बाद कमाने-खाने शहर चले गए थे और बुआ रह गई थी अकेली।
बशीर ने जाकर उनसे बात की और उनको मना लिया अपनी बहनों के साथ रहने के लिए।
कुछ दिनों बाद बशीर रजनीश के साथ शहर की ओर रवाना हो गया और उसके दल का सदस्य बन गया। धीरे-धीरे वो सियासत के दाँव-पेच सीखने लगा था। उन्हीं दिनों उसे पता चला कि इस ज़माने में अब ईमानदारी नाम की चिड़िया का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है। हर किसी के रग-रग में बेईमानी बहने लगी है।
बशीर को अपनी ईमानदारी के हाथों कई बार नाकामी का सामना करना पड़ा और कई दफ़ा अपमानित भी होना पड़ा। बार-बार लगती इन ठोकरों ने उसको सबक दिया कि वह कभी भी इस काम को ईमानदारी से करके कामयाबी हासिल नहीं कर सकता, उसको भी ख़ुद को बदलना होगा।
उसके बाद बशीर ने सही और ग़लत के फ़र्क को ही मिटा दिया और जो भी उसकी मंज़िल के रास्ते में आया वो सबको गिराता चला गया, और महज़ पाँच सालों की मेहनत में ही एम. एल. ए. की कुर्सी तक पहुँच गया।
बीते पाँच सालों में बशीर ने बहुत सी उपलब्धियां हासिल कर ली थीं। शहर में आलिशान सा घर बनवा लिया, सारी सुख-सुविधा जुटा ली थी, हर ऐशो-आराम मुहैया करा लिया था, कई एकड़ ज़मीनें ख़रीद लीं, दोनों बहनों की शादियां भी धूमधाम से कर चुका था।
मगर कहते हैं न—कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। तो बशीर ने भी इन सालों में इतना सब कुछ पाया था तो रजनीश जैसे हमदर्द दोस्त को भी वो गंवा बैठा था।
सियासत एक ऐसी तिलिस्माती दुनिया होती है कि एक बार कोई इसके संपर्क में आ गया तो फिर इसके तिलिस्म से बच नहीं सकता, ना ही इससे कभी निकल सकता है और यह तिलिस्मी दुनिया कुर्बानियां भी बहुत मांगती है।
बशीर भी अब उसी दुनिया में रम गया था। इतनी जल्दी जो उसने इतनी शोहरत पाई थी, एम.एल.ए. की सीट हासिल की थी, उसके लिए उसने कइयों को पीछे धक्का देकर ख़ुद आगे आया था और उन पीछे रह जाने वालों में उसका जिगरी दोस्त, उसका भाई रजनीश भी था।
जिसकी वजह से वह यहाँ तक पहुँचा था, जो उसके बुलंदी छूने का ज़रिया बना था, बशीर को उसको ही रौंदकर आगे निकलना पड़ा था। उसे अफ़सोस तो हुआ था लेकिन जीत का नशा ऐसा होता है कि सगे माँ-बाप तक को भूला देता है, यह तो फिर दोस्त था।
बशीर अपने अंदर के उस मासूम से शख़्स को अपने गाँव की गलियों में ही कहीं छोड़ आया था, जिसके दिल में हर किसी के लिए मोहब्बत बसती थी, जो हर किसी का हमदर्द था।
(क्रमश:)
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