“कामयाबी वही, जो इंसान को ऊँचा उठाए—उसका ज़मीर न गिराए।”
आश हम्द, पटना( बिहार)
शहर की ओर पहला कदम
वो आदमी ऐसे उसके पास आकर बोला जैसे न जाने कब से उसे जानता हो। बशीर ने हैरानी से देखते हुए उन सज्जन से हाथ मिलाया।
“भाई, क्या मैं आपको जानता हूँ?”
बशीर की बात सुनकर वो हँस दिए और उसके साथ ही बैठते हुए बोले—
“नहीं, आप मुझे नहीं जानते ना मैं आपको जानता हूँ लेकिन मैं आपको जानना चाहता हूँ। और आपके साथ मिलकर काम भी करना चाहता हूँ, क्या आप मेरे साथ शहर आना चाहेंगे?”
“शहर?”
वो सज्जन तो आज बशीर को हैरान पर हैरान किए जा रहे थे। वो अवाक सा उनका मुँह देखता रहा।
“हाँ, मेरा नाम रजनीश है और मैं एक सियासी पार्टी के लिए काम करता हूँ। अभी मैं एक दल बना रहा हूँ तो मैं भरोसेमंद लोगों की तलाश में हूँ। मैं भी इसी गाँव का निवासी हूँ, अभी आया हुआ हूँ घर, तो सोचा दो-चार लोग मेरे गाँव के भी जुड़ जाएंगे तो उनका भी कुछ अच्छा हो जाएगा। मैं कई दिनों से आपको यहाँ रोज़ शाम को आते हुए देखता हूँ, आपकी मेहनत और ईमानदारी का मैं कायल हो गया हूँ सच में भाई!”
“बहुत शुक्रिया भाई, लेकिन मैं किस तरह आपके काम आ सकता हूँ?”
बशीर ने कुछ सोचते हुए पूछा।
“हमारे दल से जुड़कर, लेकिन पहले आप अच्छी तरह से सोच लीजिए और अपने परिवार से मशवरा भी कर लीजिएगा क्योंकि फिर आपको फुरसत कम ही मिल पाएगी।”
“ठीक है भाई, मैं सोचकर जवाब बता दूंगा आपको।”
कहकर बशीर ने रजनीश से हाथ मिलाया और अपने घर की ओर बढ़ गया। घर आकर खाना खाकर सीधा अपने कमरे में आकर लेट गया। बहुत ज़्यादा थके होने के बावजूद भी आज नींद उसके आस-पास भी नहीं फटक रही थी। रात भर वो सोचता रहा, खुली आँखों से सुनहरे कल के सपने सजाता रहा। यूँ ही जगे-जगे पूरी रात कैसे बीत गई उसे पता ही नहीं चला।
होश तो उसे तब आया जब दूर मस्जिद से फज्र की अज़ान की आवाज़ आने लगी। रात भर वो असमंजस में रहा था लेकिन अज़ान की आवाज़ सुनते ही उसने अटल फ़ैसला ले लिया।
पर जब सुबह अपनी बहनों को बताया तो उन्होंने साफ़ मना कर दिया—
“नहीं भाई! आप यह सब काम नहीं करेंगे, बिल्कुल भी नहीं!”
जमीला ने अपने लहज़े को सख़्त होने से रोकते हुए कहा। क्योंकि सामने बैठा भाई सिर्फ़ उम्र में ही बड़ा नहीं था बल्कि माँ-बाप दोनों की जगह था और उसका एहतिराम तो लाज़मी था।
“ऐसा क्यों कह रही है तू जामू? रजनीश भाई मुझे भले इंसान लगे, वो कोई ग़लत काम थोड़ी ना करेंगे!”
“भाई, हम नहीं जानते उन्हें और एक दिन की मुलाक़ात में कोई किसी को नहीं जान सकता। और हम यह भी नहीं कह रहे हैं कि वो कोई ग़लत काम करते हैं या सही। भाई, राजनीति आप जैसे सीधे-सादे लोगों के लिए नहीं है हम यह कह रहे हैं।”
छोटी सकीना ने भी बहुत समझदारी से भाई को समझाने की कोशिश की। लेकिन बशीर अभी कुछ सुनने के मूड में नहीं था, वो किसी भी तरह इस मौक़े को गँवाना नहीं चाहता था।
“सक्कू.. तू भी…? कम से कम तू तो मुझे समझ! देखो, मेरी बहनों मेरी जान हो तुम दोनों और मैं जो भी करता हूँ वो तुम दोनों को सोचकर ही करता हूँ। रजनीश भाई के ऑफ़र में मुझे आगे बढ़ने की राह नज़र आ रही है जिस पर चलकर मैं तुम दोनों को तुम्हारी मंज़िल तक पहुँचा सकता हूँ, एक अच्छी सी ज़िंदगी दे सकता हूँ…”
बशीर अपनी बात कहकर चुप हो गया। लेकिन उसने जता दिया था कि वो रजनीश के साथ काम करने का फ़ैसला कर चुका है।
जमीला ने अफ़सोस से अपने प्यारे भाई की ओर देखा, जिसके चेहरे पर अभी भी बच्चों जैसी मासूमियत झलकती थी। सफ़ेद कुर्ते-पजामे, कंधे पर सफ़ेद गमछा लिए उसका हैंडसम भाई राजनीति के दलदल में उतरने जा रहा था और वो कुछ कर भी नहीं पा रही थीं।
समुन्दर में लहरें जब उठती हैं तो वो कुछ न कुछ तबाही मचाकर ही वापस लौटती हैं। उनके जोश-ओ-जुनून के आगे पेड़-पौधे, इमारतें ही नहीं पहाड़ भी ढहने लगते हैं। अभी वही जोश-ओ-जुनून बशीर खान में देखने को मिल रही थी, जिसे देखकर उसकी बहनों का ख़ौफ़ज़दा होना तो लाज़मी था।
(क्रमश:)
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