“डिजिटल दौर में सरल सा काम भी बन गया इतना जटिल!”
(AI GENERATED CREATION)
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
नाश्ते से पहले प्रोफाइलिंग
कहते हैं कि जमाना बदल रहा है।
पहले लोग सुबह उठकर चाय पीते थे, अब चाय पीने से पहले यह तय करते हैं कि उसकी तस्वीर इंस्टाग्राम पर किस एंगल से अच्छी लगेगी।
पहले नाश्ता भूख मिटाने के लिए किया जाता था। अब नाश्ते के साथ अपनी पहचान, पसंद, स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति और सोशल मीडिया की प्रतिबद्धता भी परोसी जाती है।
इसी बदलते जमाने में हमारे शहर में एक नई दुकान खुली—
“कस्टमाइज्ड ब्रेकफास्ट सर्विस।”
दुकान के बाहर चमकता हुआ बोर्ड लगा था—
“आपकी पसंद—हमारा नाश्ता।”
नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था—
“ग्राहक की सुविधा के लिए ऑर्डर से पूर्व आवश्यक जानकारी देना अनिवार्य है।”
मैंने सोचा—वाह! आखिरकार कोई तो है जो ग्राहक की सुविधा का इतना ध्यान रखता है।
मैं अंदर गया।
काउंटर पर बैठे युवक ने मुस्कुराकर कहा,
“सर, पहले अपना मोबाइल निकालिए।”
मैंने सोचा, शायद डिजिटल भुगतान करना होगा।
उसने कहा,
“नहीं सर, पहले फॉर्म भरना होगा।”
“कौन-सा फॉर्म?”
“ब्रेकफास्ट प्रोफाइलिंग फॉर्म।”
मैंने पूछा, “नाश्ता करना है या सरकारी नौकरी के लिए आवेदन?”
वह मुस्कुराया।
“सर, यह आधुनिक ग्राहक-सेवा है।”
मोबाइल पर फॉर्म खुला।
पहला सवाल—नाम।
यह तो आसान था।
दूसरा—उम्र।
थोड़ा कठिन, लेकिन भर दिया।
तीसरा—पता।
चौथा—मोबाइल नंबर।
पाँचवाँ—लंबाई।
छठा—वजन।
सातवाँ देखकर मेरी उँगली स्क्रीन पर रुक गई—
“कृपया अपनी तोंद की अधिकतम परिधि सेंटीमीटर में दर्ज करें।”
मैंने युवक की ओर देखा।
वह बिल्कुल निर्विकार था।
मैंने पूछा, “भाई, यह समोसे के लिए है?”
“जी सर।”
“समोसे को मेरी तोंद से क्या लेना-देना?”
“सर, हम ग्राहक को समग्र रूप से समझते हैं।”
मैंने मन में सोचा—आज तक तो डॉक्टर भी मुझे इतनी गहराई से नहीं समझ पाया।
फॉर्म आगे बढ़ा।
“आपकी तोंद का प्रकार?”
छोटा।
मध्यम।
उभरता हुआ।
सुस्पष्ट।
और अंत में—
“आत्मविश्वास से परिपूर्ण।”
मैंने आखिरी विकल्प चुनने की कोशिश की, लेकिन सिस्टम ने लिखा—
“कृपया वास्तविक विकल्प चुनें।”
मैंने मध्यम पर क्लिक कर दिया।
अब समोसे की बारी थी।
फॉर्म में लिखा था—
“कृपया अपने समोसे के लिए आलू की मात्रा चुनें।”
25 ग्राम।
50 ग्राम।
75 ग्राम।
100 ग्राम।
फिर पूछा—
“मटर कितने दाने?”
10, 20, 30, 50 या 100।
मैंने 20 चुने।
“मूँगफली कितनी?”
मैंने 10 चुना।
“धनिया—बारीक कटा हुआ या खड़ा?”
मैंने सोचा, धनिया भी अब व्यक्तित्व के आधार पर परोसा जाता है।
फिर आया—
“हींग की मात्रा—मिलीग्राम में।”
मैंने मोबाइल नीचे रख दिया।
“भाई, जरा शेफ को बुलाओ।”
शेफ आया।
मैंने पूछा, “भाई, तुम्हें सच में पता है कि एक समोसे में कितने मिलीग्राम हींग डालनी चाहिए?”
उसने गर्व से कहा,
“सर, हमारा सिस्टम बताता है।”
“और अगर सिस्टम गलत हुआ?”
“सर, सिस्टम गलती नहीं करता।”
मैंने कहा, “गलती इंसान करता है।”
वह बोला,
“इसीलिए तो हमने इंसान को सिस्टम से हटा दिया है।”
मुझे पहली बार लगा कि तकनीक सचमुच बहुत आगे निकल चुकी है।
(क्रमश:)
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