“ज़िंदगी की सबसे बड़ी दौलत रिश्ते हैं, और उनकी सबसे कीमती धरोहर यादें।”
–सुशीला तिवारी, पश्चिम गांव, रायबरेली
यादें
गाँव के आखिरी छोर पर पीपल का वो पेड़ आज भी खड़ा है। उसी की छाँव में मेरा बचपन बीता। बाबा कहते थे, “पीपल की यादें सौ बरस पुरानी होती हैं।” तब समझ न आता, पर आज समझता हूँ।
दादी की गोद में सिर रखकर कहानियाँ सुनना, माँ के हाथ की गुड़ वाली रोटी, और पिताजी का कंधे पर बिठाकर मेले ले जाना— सब इसी पेड़ के नीचे दर्ज है।
सबसे हसीन याद थी छुटकी की। छुटकी मेरी बचपन की दोस्त। दो चोटियाँ, नाक पर छोटा सा तिल और हँसी जो पूरे खेत में गूँज जाए। हम दोनों ने इसी पीपल पर अपना नाम खुरचा था। कच्ची इमली तोड़ते, कागज़ की नावें बरसात में बहाते, और वादा करते कि कभी जुदा नहीं होंगे।
फिर शहर पढ़ने चला गया। चिट्ठियाँ आती रहीं। छुटकी लिखती— “पीपल पर तेरा नाम अब भी है, पर तू कब आएगा?” मैं जवाब देता— “बस एक नौकरी लग जाए।” नौकरी लगी, शहर की भागदौड़ में चिट्ठियाँ कम हो गईं। एक दिन बाबा का तार आया— “छुटकी की शादी है, आ जा।” मैं नहीं जा पाया। मीटिंग थी, प्रमोशन अटका था।
बीस साल बाद गाँव लौटा। पीपल वहीं था, पर अब बूढ़ा हो चला था। उसकी जड़ें उखड़ रही थीं। मैंने छूकर देखा— छाल पर अब भी था “राहुल + छुटकी”। आँखें भीग गईं। बगल वाले रामू काका बोले, “छुटकी बिटिया पिछले साल गुजर गई। आखिरी वक्त तक इसी पेड़ के नीचे बैठी तेरा इंतज़ार करती थी। कहती थी, राहुल आएगा तो कहूँगी कि वादे निभाए नहीं जाते क्या?”
मैं वहीं बैठ गया। हवा में दादी की लोरी थी, माँ की रोटी की खुशबू थी, पिताजी का कंधा था। और छुटकी की हँसी… वो भी थी।
शहर ने मुझे सब दिया, पर यादें छीन लीं। आज समझ आया— मकान बना लेने से घर नहीं बनते, और तरक्की कर लेने से ज़िंदगी नहीं बनती। ज़िंदगी बनती है उन लम्हों से जो पीपल की छाल पर खुरच दिए जाते हैं।
लौटते वक्त मैंने एक नई टहनी लगाई। उसके पास पत्थर रखा और लिखा— “माफ़ कर देना छुटकी”।
कुछ यादें कहानी नहीं होतीं, सज़ा होती हैं। जो उम्र भर साथ चलती हैं।
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मन का बोझ
सुशीला का घर रेल की पटरियों के पास था। रोज़ सुबह 5:17 की ट्रेन की सीटी से उसकी आँख खुलती। फिर वो चाय चढ़ाती, और चुपचाप खिड़की से बाहर देखने लगती।
पिछले तीन साल से यही सिलसिला था। बेटा पुणे चला गया था नौकरी पर। जाते वक़्त बोला था, “माँ, बस दो साल की बात है। घर बना लूँगा, फिर तुझे ले जाऊँगा।”
दो साल कब तीन में बदल गए, पता ही न चला। फोन आता तो बस, “ठीक हूँ माँ, व्यस्त हूँ।” सुशीला पूछती, “खाना खाया?” जवाब में सिर्फ़ “हूँ” सुनाई देता।
पड़ोसन कमला कई बार कहती, “दीदी, मन हल्का कर लो। बहू-बेटे से साफ़ कहो कि अकेले मन नहीं लगता।” पर सुशीला मुस्कुरा देती। “बच्चों पर बोझ क्यों बनूँ?”
दीवाली आई। कॉलोनी के सब घरों में रंगोली, दिए, हँसी। सुशीला ने भी दिए जलाए, पर आँगन सूना लगा। रात को दरवाज़ा खटका। बेटा सामने था। हाथ में मिठाई का डिब्बा और आँखों में पानी।
“माँ, माफ़ कर दे। प्रमोशन के चक्कर में भूल गया कि त्योहार पर माँ अकेली होगी।”
सुशीला ने उसे गले लगा लिया। पर गले लगते ही बेटा चौंक गया। माँ की पीठ झुकी हुई थी, जैसे बरसों का बोझ ढो रही हो।
“माँ, तू इतनी कमज़ोर कब हो गई?”
सुशीला हँसी, “बेटा, शरीर का बोझ तो उम्र दे देती है। पर मन का बोझ? वो तो तब हल्का हुआ जब तू दरवाज़े पर आया।”
बेटा समझ गया। उसने माँ का हाथ पकड़ा, “अब बोझ तू नहीं, हम उठाएँगे। चल, बैग पैक कर।”
उस रात 5:17 की ट्रेन गुज़री। पर सुशीला की आँख नहीं खुली। वो बेटे के कंधे पर सिर रखे, बरसों बाद चैन से सो रही थी। कभी कभी मन का बोझ सिर्फ़ एक “मैं हूँ ना” सुनने से उतर जाता है।
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