“हर ठोकर के बाद एक नई राह मिलती है, बस कोशिश कभी मत छोड़िए।”
विजय कुमार तैलंग जयपुर, राजस्थान
मैंने गौर किया, मेरे जूते की एड़ी घिसकर तल्ले की बराबरी करने लगी थी। अब ये जूता जवाब देने की स्थिति में आ गया था।
मैंने जूते को उठाकर समझाया कि कुछ दिन और चल ले भाई। शायद मुझे नया जूता खरीदने का कुछ जरिया बन जाए!
जूते ने शायद सुना नहीं और तल्ले के बाएँ हिस्से की सिलाई भी टूट गई। पुराना मोची था, मार्केट के कोने में बैठता था, उसने मुझे पहचान कर एक गहरी सी मुस्कान फेंकी जैसे कह रहा हो कि फिर आ गए वही जूता सुधरवाने। मैंने उसकी मुस्कान का आशय समझ एक शर्मिंदगी वाली मुस्कान फेंकते हुए कहा – “”अबकी लास्ट चांस है। अगली बार नये जूते ले लूंगा और तुम्हीं से पोलिश करवाऊंगा।”
“क्यों भाईसाब, क्या अगली बार कोई लॉटरी लगने वाली है?”
“नहीं, अगली बार मैं समझौता कर लूंगा और मुझे नौकरी मिल जायेगी।”
मोची मुझसे जूता लेकर सुधारने लगा और मैं उसके पास पड़ी चप्पल पहन कर वहीं पत्थर पर बैठ गया।
“कैसा समझौता बाबूजी? ” वह पूछ बैठा।
“भाई, मैंने जो पढ़ाई की है उसके मुताबिक नौकरी तो हैं परंतु मुझे मिलेगी नहीं क्योंकि मेरे पास कोई बड़े व्यक्ति की सिफारिश नहीं है। अब मुझे नीचे तबके की नौकरी करनी होगी, यही समझौता है। “
“यानी आपको अपनी लियाकत के मुताबिक न नौकरी मिलेगी और न ही पैसा? “
“यही समझ लो! “
“आप कितना पढ़े हो? “
“मत पूछो भाई, बी. कॉम किया है वो भी अच्छे नंबरों से, लेकिन कोई मार्क शीट व प्रमाण पत्र देखे भी तो सही। छूटते ही पूछते हैं किसकी सिफारिश लाये हो? “
“क्या आपका इस शहर में कोई जान पहचान का नहीं है?” मोची मेरे जूते की सिलाई करता हुआ बोला।
“मैं गाँव से शहर आया और यहीं रहकर पढ़ाई की। घर वालों के पास जितना पैसा था उन्होंने मेरी पढ़ाई में लगा दिया और बोले अब अपना खर्चा खुद उठाओ। अब ये हालत है कि जहाँ किराये से रह रहा था वहाँ से किराया न होने के कारण छोड़ना पड़ा और छोटे से कमरे में गाँव के दूसरे मजदूरों के साथ साझा रह रहा हूँ। जिन लेक्चरर्स से कॉलेज में पढ़ा था वे मुझे नौकरी के लिए सिफारिश देने को तैयार नहीं हुए। अन्य कोई यहाँ मेरी जानकारी भी नहीं। “
“लीजिये, आपका जूता तैयार हो गया। “
मैंने जूता पहना और मोची को उसका मेहनताना देकर चल दिया। जूते में संतुलन न होने के कारण पैर ऊपर नीचे हो रहे थे किंतु मुझे एक कंपनी में चपरासी के जॉब के लिए साक्षात्कार देने जाना था सो जल्दी-जल्दी चल दिया।
क्रमश: