“लोक-रामायणों में सीता: आस्था, लोकस्मृति और तटस्थ विवेचन का अनोखा संगम”
-दिविक रमेश,नोएडा
डिस्क्लेमर:
“यह लेख लोक-साहित्य और विभिन्न रामकथा-परंपराओं के अकादमिक एवं सांस्कृतिक अध्ययन के संदर्भ में लिखा गया है। इसका उद्देश्य किसी धार्मिक आस्था को आहत करना नहीं, बल्कि भारतीय लोक-स्मृतियों और साहित्यिक विविधताओं को समझना है।”
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सीतायन’ प्रो. प्रतिभा मुदलियार के द्वारा डॉ. तारा भवाळकर की मुल मराठी कृति का हिंदी में अनूदित रूप है। कवि-अनुवादक प्रो. प्रतिभा मुदलियार विशेष रूप से मराठी और हिंदी तथा हिंदी और मराठी साहित्य के बीच आज अनुवादक की भूमिका में एक महत्त्वपूर्ण और जाना-पहचाना नाम है।
‘मनोगत’ के अनुसार, ‘प्रस्तुत पुस्तक ‘सीतायन’ लोकमानस में सीता की खोज का ही एक प्रयास है।‘ और यह भी- ‘इसके कुछ आलेख प्रसंगानुसार लिखे गए हैं, पर इनमें से अंकुश पुराण, चित्रपट रामायण और चंद्रावती रामायण और उसका अनुवाद, दशरथ जातक, आदिवासियों का ‘सीतायन’ खास इस पुस्तक के हेतु किया गया लेखन है।‘ बंगाल की चंद्रावती रामायण को सबसे पुरानी लोक रामायण माना गया है।
बताना चाहूँगा कि ‘सीतायन’ शीर्षक से चित्रा बनर्जी दिवाकरुनी का एक उपन्यास भी है जो राम की पत्नी सीता की कहनी के इर्द-गिर्द घूमता है। इस उपन्यास में सीता के माध्यम से स्त्री से केंद्रित अनेक सवाल उठाए गए हैं। ‘सीतायन’ नाम का एक महाकाव्य मैथिली भाषा के साहित्यकार वैद्यनाथ मल्लिक ‘विधु’ का भी है।
यह जाना हुआ तथ्य है कि राम कथा और उसकी प्रमुख पात्र सीता के प्रमुख दो रूप उपलब्ध हैं- एक शास्त्रीय अथवा शिष्ट समाज का रूप और दूसरा लोक सम्मत रूप। यह भी अब सर्वविदित है कि मान लिया गया है कि लोक सम्मत रूप भी कम महत्त्व का नहीं होता। लोक के विश्वास, रीति-रिवाज, अंधविश्वास, प्रथा, अनुष्ठान, कला, साहित्य आदि सब का समावेश लोक-साहित्य में होता है। मानव जन्म, पृध्वी का निर्माण , देवताओं के व्यवहार, सामाजिक और राजनीतिक गुण-दोष, भूत-प्रेत,प्रकृति आदि सबकुछ इस साहित्य के विषय होते हैं। यह वाचिक या श्रुति परम्परा की देन है। इसके रचयिता अज्ञात रहे हैं। मूलत: यह साहित्य आधुनिक सभ्यता से दूर प्रकृति की गोद में पले, प्राय: आदिम रीति-रिवाजों, त्योहारों आदि का निर्वाह करने वाले लोक-समाज कि कल्पना और भाव-प्रधान लेकिन संवेदनायुक्त सामूहिक मौखिक रचना है जो एक कंठ से दूसरे कंठ तक जाती है।इसमें आनंद भी होता है और शिक्षा भी। नीति-शिक्षा इसका महत्त्वपूर्ण उद्देश्य रहा है। सुख भी होता है और दु:ख भी। इसकी सीमा देशकाल तक सीमित नहीं होती। पुराण,धर्म आदि सब इसके स्रोत हो सकते हैं। स्थानीयता तो होती ही है। भारत विभिन्न लोक संस्कृतियों का देश है। यहां विभिन्न संस्कृतियों के संघर्ष भी हुए हैं, समंवय भी हुए हैं जिनकी उपस्थिति यहां की लोककथाओं में देखी जा सकती है।
लोक साहित्य, आधुनिक संदर्भों में, शास्त्रीय साहित्य अथवा शिष्ट समाज के साहित्य से भिन्न शिक्षा विहीन और असंस्कृत जनता का साहित्य मान लिया गया है और ग्राम ज्ञान, लोक ज्ञान तथा जन ज्ञान की श्रेणी में गिना जाता है। इसलिए काफी हद तक उपेक्षा की मार सहता रहा है। तो क्या लोक-साहित्य की आज कोई प्रासंगिकता और जरूरत सच में नहीं रह गई है? बावजूद इस सच के कि लोक-साहित्य और लोक संस्कृति का, सोच अथवा दृष्टि के रूप में बहुत सा प्रदत्त आज पतनोन्मुख भी कहा जा सकता है और सामाज को पीछे ले जाने वाला भी, क्या हम इस सच्चाई से मुंह मोड़ सकते हैं कि विज्ञान और आधुनिक तर्क-वितर्कों का सहारा लेते हुए भी हमारे लोक विश्वास, दबे-छिपे ही सही, हमारे साथ चलते रहते हैं।
क्रमश:
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