“बालमन की संवेदनाओं, कल्पनाशीलता और सकारात्मक दृष्टि का जीवंत साहित्यिक उत्सव”
दिविक रमेश,नोएडा
बिना अधिक विस्तार में जाए यही कहना चाहूँगा कि भारत का बालक केवल शहरों या महानगरों में रहने वाला नहीं है। वह जंगलों में भी रहता है, पहाड़ पर भी रहता है, समुद्री इलाकों में भी रहता है। गाँव में भी रहता है तो कस्बों में भी रहता है। साथ ही वह अमीर, गरीब, मध्यम जैसे सभी वर्गों से है। इतना ही नहीं वह अनेक धर्मों को मानने वाले परिवारों से भी है। तो आज बालसाहित्यकार के समक्ष, मिलजुल कर, सब बच्चों को ध्यान में रखना है और उत्कृष्ट लेखन रचना है।
मुझे यह भी लगा है कि वह साहित्य उत्कृष्टता की राह पर अधिक बढ़ा लगता है जिसमें बच्चे को उसकी भूमिका प्रदान की गई है। अर्थात जो बच्चे की ओर से लिखा गया है। बड़ों की ओर से बच्चों के लिए नहीं।
शादाब आलम की कविता ‘दी है दरियादिल’ का अंश देखिए-
दी हंसमुख है, दी बड़ी बहादुर
दी है दरियादिल।
दिखा उसे एक भूखा बच्चा
टिफिन खोल कर उसे खिलाया।
अपनी पानी की बोतल से
पूरा पानी उसे पिलाया।
एक और कविता देखिए – ‘हवा से’।
दद्दा के पिटने के डर से,
हाय! न मैं बाहर जा पाता।
पर तुम तो स्वछंद सदा की,
जहाँ चाहती, जाती हो तुम।
हवा, कहाँ से आती हो तुम?
डॉ. गोपाल राजगोपाल की कविता ‘माना हम छोटे बच्चे हैं’ की निम्न प्रशनाकुलता बहुत कुछ जरूरी कहती प्रतीत होती है-
माना हम छोटे बच्चे हैं
सबकी नजरों में कच्चे हैं
हमसे ताल्लुक जिन बातों का
हमसे भी तो पूछी जाए।
फहीम अहमद की कविता का अंश देखिए-
मोबाइल में बिजी हैं पापा
लैपटॉप पर मम्मी जी।
बात करेंगे कब वे मुझसे
आकर लेंगे चुम्मी जी।
और –
कंधे पर लटकाए थैला
कूड़-कचरा भरता है।
मजबूरी में मारा-मारा,
बच्चा दर-दर फिरता है।
जसिंता केरकेट्टा की कविता –
कुछ लोग इस धरती पर
जिंदा लोगों के नाम पर
पेड़ काटते हैं
पर कुछ लोग इस धरती पर
मर गए लोगों की याद में
पौधे लगाते हैं
यहाँ मैं यह भी कहना चाहूँगा कि आज के श्रेष्ठ रचनाकारों में वे भी हैं जिन्होंने लय और छंदगत प्रयोग किए हैं और वे समय के साथ अवश्य स्वीकृत भी होंगे।
मुझे कुछ और रचनाएँ याद आ रही हैं जिन्हें पढ़ा जाना चाहिए। इनमें मोहम्मद अरशद खान की कविता ‘रेल के डिब्बे में’, ‘ऊँट का फूल’ (प्रभात) और इधर की दो पुस्तकों- ‘बाघू के किस्से’ (बाल नाटक, दिशा ग्रोवर), ‘टुइयाँ’ (मधु पंत) सहित कितनी ही रचनाएँ हैं जिन्हें खोज कर पढ़ा जाना चाहिए।
लेख के अंत में मैं एक सशक्त बाल कविता प्रस्तुत करना चाहूँगा। कोरियाई सुविख्यात बालसाहित्यकार यून सॉक जूंग की यह बाल कविता है –
घर का काम मिला है मुझको
नक्शे में दुनिया दिखलाऊं
रात बैठ कर मेहनत की पर
रहा अधूरा क्या बतलाऊं
देश न हो जो तेरा मेरा
राष्ट्र न हो जो मेरा तेरा
हो बस दुनिया देश बड़ा सा
तब होगा आसान बनाना
नक्शे में दुनिया बतलाना
(प्यारी सी दुनिया दिखलाना)।
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