“लोक-रामायणों में सीता: आस्था, लोकस्मृति और तटस्थ विवेचन का अनोखा संगम”
–दिविक रमेश,नोएडा
डिस्क्लेमर:
“यह लेख लोक-साहित्य और विभिन्न रामकथा-परंपराओं के अकादमिक एवं सांस्कृतिक अध्ययन के संदर्भ में लिखा गया है। इसका उद्देश्य किसी धार्मिक आस्था को आहत करना नहीं, बल्कि भारतीय लोक-स्मृतियों और साहित्यिक विविधताओं को समझना है।”
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…प्रो. बलदेव उपाध्याय के शब्दों में, ‘ लोक-संस्कृति शिष्ट-संस्कृति की सहायक होती है। किसी देश के धार्मिक विश्वासों, अनुष्ठानों तथा क्रियाकलापों के पूर्ण परिचय के लिए दोनों संस्कृतियों में परस्पर सहयोग अपेक्षित रहता है।‘ मैं समझता हूं कि यह मत काफी संतुलित है। हमारे बहुत से श्रेष्ठ और शिष्ट समाज का एक महत्त्वपूर्ण कच्चा स्रोत लोक-साहित्य भी हो सकता है और है।
एक बात और। जनश्रुति या जनस्वीकृति के बिना लोक-साहित्य या लोक-संस्कृति का अस्तित्व संभव नहीं रहा। अत: लोक तथा लोक-संस्कृति की एक परम्परा भी होती है। वाल्मीकि रामायण के बालकाण्डम के प्रथम सर्ग से एक उदाहरण लेकर इस तथ्य को समझा जा सकता है। नारद ने तपस्वी वाल्मीकि से पूछा कि इस समय संसार में गुणवान, धर्मज्ञ, उपकार माननेवाला, सत्यवक्ता और दृढ़प्रतिज्ञ कौन है तो उत्तर मिला –
इक्ष्वाकुवंशप्रभावो रामो नाम जनै: श्रुत:।
नित्यात्मा महावीर्यो द्युतिमान धृतिमान वशी ॥8॥
अर्थात इक्ष्वाकु के वंश में उत्पन्न हुए एक ऐसे पुरुष हैं, जो लोगों में रामनाम से विख्यात हैं, वे ही मन को वश में रखने वाले, महाबलवान, कांतिमान, धैर्यवान और जितेंद्रिय हैं। यहां राजमहल में रहने वाला न कह कर ‘जनै: श्रुत:’ अथवा लोक में विख्यात अर्थात लोक के द्वारा जाना और स्वीकृत कहा गया है।
प्रस्तुत पुस्तक अनेक कारणों से हर पाठक-वर्ग के लिए महत्त्वपूर्ण है। इसका मुख्य कारण है लेखिका के द्वारा लोक सम्मत रूप भी देना और उसका विवेचनात्मक पक्ष भी प्रस्तुत करना। विवेचन में लोक सम्मत रूप पर उठाए गए सवालों के साथ विद्वानों जिनमें सामाज शस्त्री, मनोवैज्ञानिक, मानव-विज्ञानी, चिंतक आदि सम्मिलित हैं, के द्वारा दिए गए उनके उत्तर भी हिस्सा बने हैं। साथ ही तर्कसंगत और संतुलित सोच की ओर ले जाने का प्रयास भी हुआ है।
क्रमश:
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