“लोक-रामायणों में सीता: आस्था, लोकस्मृति और तटस्थ विवेचन का अनोखा संगम”
–दिविक रमेश,नोएडा
डिस्क्लेमर:
“यह लेख लोक-साहित्य और विभिन्न रामकथा-परंपराओं के अकादमिक एवं सांस्कृतिक अध्ययन के संदर्भ में लिखा गया है। इसका उद्देश्य किसी धार्मिक आस्था को आहत करना नहीं, बल्कि भारतीय लोक-स्मृतियों और साहित्यिक विविधताओं को समझना है।”
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…उदाहरण के लिए रामायण और महाभारत की कहानियों को उचित ही मौखिक परंपरा से जोड़ते हुए बताया गया है कि ‘ महाभारत में मूलतः सूतों द्वारा कही गयी कथाएँ हैं। सूत लोक-गायकों की एक जनजाति है। सूत भारत भर में घूम-घूम कर कथाएँ गा-गाकर सुनाते थे। अतः रामायण कुशी-लव नामक लोकगायकों की परंपरा से आयी लोकरामायण ही है। वह सारी लोककथाएँ ही हैं।‘ इसके बाद दूसरा महत्त्वपूर्ण तथ्य भी उजागर किया गया है- ‘ जिस क्षेत्र में यह कथाएँ कही गई उस भौगोलिक क्षेत्र की छाप उस पर बहुत बड़ी मात्रा में पड़ती गयी, अनजाने पड़ती गयी है। यानी अगर वह कहानी महाराष्ट्र में कही गई है तो राम का रिश्ता कहीं न कहीं अकाल से जोड़ा जाता है। अगर कहानी समुद्री प्रदेश में बतायी गई है तो राम का संबंध समद्र के साथ जोड़ दिया जाता है। इसलिए भौगोलिक परिसर का प्रभाव उन कहानियों के विवरण में हमें दिखाई देता है।‘
पुस्तक में, निश्चित रूप से, भारतीय स्तर पर लोक की सीता पर केन्द्रित पूरी सामग्री ही शोधपरक विवेचन से समृद्ध है।, लेकिन विशेष रूप से चंद्रावती रामायण (बांग्ला) और ‘दशरथ जातक’ पर बहुत विस्तार से प्रस्तुत की गई सामग्री ध्यान खींचती है। 13 खंडों वाली चंद्रावती रामायण का तो हिंदी अनुवाद भी है इस पुस्तक में। पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में निर्धारित इस कृति को लेकर काफी विवाद हुआ था।
लेखिका के अनुसार परंपरावादियों ने चंद्रावती (चंद्रबती) रामायण को ‘नारीवादी रामायण’ कहकर उसकी आलोचना की थी। किंतु स्त्रीवादी अध्येताओं ने उसका स्पष्टिकरण यूँ किया कि यह सीता की ओर से लिखी/सुनाई गई कथा है और इसमें राम को विशेष महत्व नहीं दिया गया है …। सारी कथा पढ़ने के बाद यह ध्यान में आता है कि जनमानस की अधिकांश कथाओं में सीता के प्रति सहानुभूति दिखायी गयी है और इसीलिए जैसा कि मैंने पहले कहा था कि ‘लोक रामायण’ में ‘रामायण’ की तुलना में ‘सीतायन’ अधिक प्रभावी है।‘ सीता के जन्म से लेकर राम के द्वारा सीता को वनवास भेजने तक की कथा का इस कृति में समावेश है। सीता के पिता को लेकर भी यह कृति विवादास्पद मानी गई। लेखिका ने कृति की महिला रचनाकार के जीवन-प्रसंगों को भी खोज निकाला है।
क्रमश:
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