“दस प्रतिशत—जो इंसानियत को सौ प्रतिशत बना दे।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
एक दिन बिल्डिंग के रहवासियों की मीटिंग बुलाई गई।
आरडब्ल्यूए अध्यक्ष ने कहा—
“ये अंशुल रोज़ पैसे बाँटता रहता है।
ऐसे लोग प्रैक्टिकल नहीं होते।
पैसा बचाओ, भविष्य सुरक्षित करो।
चैरिटी से कुछ नहीं होता।”
कुछ लोग तुरंत सहमत हो गए।
“हाँ, बिल्कुल।
आजकल कौन अपनी कमाई का दस प्रतिशत दान करता है?”
“ये सब दिखावा है।”
सुहानी यह सुनकर गुस्से में आ गई।
“आप लोग किसी की नीयत पर सवाल क्यों उठा रहे हैं?
असल में आप लोग वो नहीं कर पाते जो अंशुल करता है,
इसलिए उसकी आलोचना कर रहे हैं।”
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
अंशुल चुपचाप खड़ा रहा।
लेकिन उस रात उसके दिल को हल्की-सी चोट जरूर लगी।
सुहानी ने उससे कहा—
“तुम इतने अच्छे हो…
लेकिन लोग तुम्हारी कद्र नहीं करते।”
अंशुल मुस्कुराया।
“मैं लोगों के लिए नहीं करता।
मैं इंसानियत के लिए करता हूँ।
और इंसानियत को किसी प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं होती।”
एक रात अचानक बिल्डिंग की दूसरी मंज़िल से धुआँ उठने लगा।
कुछ ही मिनटों में आग फैल गई।
चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई।
लोग घबराकर बाहर भागने लगे।
तभी सुहानी चीख उठीं—
“ज्योति अंदर है!
कोई उसे बचाओ!”
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
किसी की हिम्मत नहीं हुई कि वह धुएँ में अंदर जाए।
अंशुल ने तुरंत एक कपड़ा पानी में भिगोया,
उसे अपने चेहरे पर बाँधा
और बिना सोचे-समझे आग के बीच दौड़ पड़ा।
सुहानी चिल्लाती रह गईं—
“अंशुल… नहीं! प्लीज़ मत जाओ!”
कुछ मिनट जो सभी को घंटों जैसे लगे।
फिर अचानक धुएँ के बीच से एक आकृति बाहर आई।
अंशुल था…
और उसकी गोद में बेहोश पड़ी ज्योति।
लोग स्तब्ध रह गए।
जिसे वे “मूर्ख दान देने वाला” कहते थे,
वह आज किसी की जान बचाने वाला नायक बन गया था।
ज्योति होश में आते ही रो पड़ी।
“भैया… आपने मेरी जिंदगी बचा ली…”
एक सप्ताह बाद बिल्डिंग के सभी लोग अंशुल के घर के सामने इकट्ठा हुए।
आरडब्ल्यूए अध्यक्ष ने शर्मिंदा होकर कहा—
“अंशुल बेटा…
हमें माफ़ कर दो।
हम तुम्हें समझ नहीं पाए।
आज हमें पता चला कि अच्छे लोग इस दुनिया के लिए कितने ज़रूरी हैं।”
ज्योति ने सिर झुकाकर कहा—
“भैया, मैं पढ़ाई में टॉप करके दिखाऊँगी।
आपका भरोसा कभी टूटने नहीं दूँगी।”
सुहानी मुस्कुराईं और बोलीं—
“आज से मैं भी अपनी कमाई का एक हिस्सा दान करूँगी।
तुमसे मैंने सीखा है कि
असली खुशी पैसे रखने में नहीं,
उसे सही जगह खर्च करने में है।”
अंशुल ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“दान की रकम बड़ी नहीं होती…
दिल बड़ा होना चाहिए।
दस प्रतिशत मेरी आदत नहीं…
मेरी जिम्मेदारी है।
जब हम सब अपने हिस्से की अच्छाई बाँटेंगे,
तभी समाज सच में चमकेगा।”
उस दिन पहली बार उस बिल्डिंग में सिर्फ बिजली की रोशनी नहीं थी—वहाँ इंसानियत की रोशनी भी चमक रही थी।
(काल्पनिक रचना)