“दस प्रतिशत—जो इंसानियत को सौ प्रतिशत बना दे।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
…धीरे-धीरे इन तीनों की जिंदगी एक-दूसरे से जुड़ने वाली थी।
एक शाम ऑफिस से लौटते समय अंशुल ने देखा कि ज्योति सीढ़ियों पर बैठी रो रही थी।
उसके हाथ में कुछ कागज़ थे और आँखों में आँसू।
अंशुल पास गया और धीरे से बोला—
“अरे ज्योति, क्या हुआ?
रो क्यों रही हो?”
ज्योति ने आँसू पोंछते हुए कहा—
“भैया… मेरी एग्ज़ाम फीस भरने के पैसे नहीं हैं।
पापा कई दिनों से बीमार हैं…
कॉलेज ने कल आखिरी तारीख बता दी है।”
यह सुनकर अंशुल के दिल में एक हल्की-सी टीस उठी।
उसने बिना एक पल सोचे कहा—
“बस इतनी-सी बात?
फीस मैं भर दूँगा।
कल सुबह सब हो जाएगा।”
ज्योति चौंक गई।
“लेकिन भैया… मैं आपका पैसा कैसे ले सकती हूँ?”
अंशुल मुस्कुराया।
“ये मेरा पैसा नहीं है,
ये समाज का हिस्सा है।
मैं तो बस एक माध्यम हूँ।”
पास खड़ी सुहानी यह सब देख रही थी।
वह धीरे से बोली—
“सच में अंशुल…
किसी को भगवान मंदिरों में दिखते हैं,
और किसी को इंसानों में।
आज मुझे भगवान तुम्हारे रूप में दिखे।”
अंशुल हल्के से हँस पड़ा।
“नहीं सुहानी…
मैं बस कोशिश करता हूँ कि दुनिया थोड़ी बेहतर लगे।”
कुछ दिनों बाद रात के करीब ग्यारह बजे अंशुल के दरवाज़े पर घबराहट भरी दस्तक हुई।
दरवाज़ा खोला तो सामने सुहानी खड़ी थीं।
उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
“अंशुल… मेरी माँ की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई है।
हॉस्पिटल ले जाना है, लेकिन एम्बुलेंस के पैसे—”
अंशुल ने तुरंत बात बीच में ही रोक दी।
“सुहानी, टेंशन मत लो।
चलो, मैं अभी कार निकालता हूँ।”
कुछ ही मिनटों में वे हॉस्पिटल पहुँच गए।
डॉक्टर ने जांच करने के बाद कहा—
“मरीज को तुरंत एडमिट करना होगा।”
सुहानी की आवाज़ धीमी पड़ गई।
“अंशुल… एडमिट चार्जेस बहुत ज्यादा हैं… मैं कैसे—”
अंशुल ने बिना कुछ कहे काउंटर पर जाकर बिल जमा कर दिया।
सुहानी की आँखें नम हो गईं।
“तुम इतना क्यों कर रहे हो?
हमारे बीच कोई रिश्ता भी तो नहीं है।”
अंशुल ने शांत स्वर में कहा—
“समाज ही हमारा रिश्ता है, सुहानी।
कभी-कभी खून के रिश्ते भी उतने काम नहीं आते,
जितना इंसानियत का रिश्ता आ जाता है।”
उसकी बात सुनकर सुहानी के मन में उसके लिए गहरा सम्मान पैदा हो गया।
लेकिन दुनिया के सभी लोग ऐसी सोच नहीं रखते थे।
एक दिन बिल्डिंग की मीटिंग बुलाई गई।
क्रमश: