“दस प्रतिशत—जो इंसानियत को सौ प्रतिशत बना दे।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
शहर के बीचों-बीच एक पुरानी लेकिन सलीके से बनी चार मंज़िला बिल्डिंग थी—शांति अपार्टमेंट।
यह कोई बहुत आलीशान इमारत नहीं थी, पर उसमें रहने वाले लोग अपनी-अपनी छोटी-छोटी दुनियाओं में खुश थे।
उसी बिल्डिंग की तीसरी मंज़िल के एक साधारण से फ्लैट में रहता था—अंशुल सक्सेना।
तीस वर्ष का युवक, एक आईटी कंपनी में नौकरी करता था।
उसकी जिंदगी बिल्कुल आम लोगों जैसी थी—सुबह ऑफिस, शाम को घर, कभी-कभी दोस्तों से मुलाकात।
लेकिन उसके व्यक्तित्व में एक ऐसी बात थी, जो उसे दूसरों से अलग बनाती थी।
वह अपनी आमदनी का दस प्रतिशत समाज सेवा में दान करता था।
कभी वह अनाथ बच्चों की पढ़ाई के लिए मदद करता,
कभी किसी गरीब बुज़ुर्ग की दवा का खर्च उठा लेता,
और कभी सड़क पर रहने वाली महिलाओं के लिए काम करने वाली संस्था को चुपचाप पैसे भेज देता।
उसका एक ही सिद्धांत था—
“जो मेरी जेब में है, उसमें समाज का भी हिस्सा है।”
वह अक्सर सोचता था—
“अगर हर इंसान अपनी कमाई का थोड़ा-सा हिस्सा भी दूसरों की मदद में लगा दे,
तो शायद दुनिया थोड़ी कम दुखी और थोड़ी ज़्यादा खूबसूरत हो जाए।”
लेकिन दुनिया को अच्छे लोगों की पहचान अक्सर देर से होती है।
अंशुल के पास वाले फ्लैट में रहती थी—सुहानी दीक्षित।
वह एक कॉलेज में प्रोफेसर थी।
स्वभाव से बेहद शांत, सादगी पसंद और संवेदनशील।
छात्र उससे सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, बल्कि जीवन की समझ भी सीखते थे।
दूसरों के दुख से वह बहुत जल्दी दुखी हो जाती थी।
किसी को परेशानी में देखना उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था।
बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर रहने वाले वॉचमैन रामलाल की एक बेटी भी थी—ज्योति।
ज्योति बारहवीं कक्षा में पढ़ती थी।
घर की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी, लेकिन उसके सपने बहुत बड़े थे।
वह अक्सर बिल्डिंग की सीढ़ियों के पास बैठकर पढ़ाई करती थी।
अंशुल कई बार उसे देखता और मन ही मन सोचता—
“अगर इस लड़की को सही मौका मिला, तो यह ज़रूर कुछ बड़ा कर सकती है।”
धीरे-धीरे इन तीनों की जिंदगी एक-दूसरे से जुड़ने वाली थी।
क्रमश: