“मोहब्बत, माँ-बाप और मजबूरियों के बीच फंसा एक अधूरा वजूद…”
आश हम्द, पटना (बिहार)
लेकिन हमेशा वह नहीं होता जो इंसान सोचता है। आदम के साथ भी वही हुआ जो कभी उसने सोचा भी नहीं था।
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आदम यूनिवर्सिटी से निकला ही था कि उसका मोबाइल वाइब्रेट करने लगा। उसने कान से लगाया – “ हेलो, हेलो.. पापा.. आप यहाँ आए हैं क्या ?” आदम पहली बार उनकी आवाज़ सुनकर बेहद ख़ुशी महसूस कर रहा था।
“ हाँ मेरा बेटा, मैं भी और तुम्हारी मम्मा भी आई हुई हैं। तुम यूनिवर्सिटी से निकल गए हो तो होटल पहुँचो ।”
“ हाँ, मैं आ रहा हूँ पापा ।” जल्दी से कॉल कट करके वह पापा के होटल के एड्रेस पर पहुँच गया। पहली बार वह अपने माँ-बाप के साथ हँसी-ख़ुशी समय बिता रहा था, मुनीर साहब अपने बेटे को ख़ुश देखकर बहुत खुश थे। लेकिन उनकी बीवी ने आदम से पूछ ही लिया – “ क्या बात है बेटा, तुम इस बार बहुत बदले बदले लग रहे हो !”
“ आपको एहसास होता है मम्मा मेरी फीलिंग्स का !”
“ कैसे नहीं होगा ? तुम मेरे बेटे हो, मेरी जान हो तुम। अपनी मम्मा को अपनी ख़ुशी में शामिल नहीं करोगे मेरे बेटे ?” रोजीना ने बेहद भावुक होकर पूछा।
“ करना तो चाहता हूँ मम्मा लेकिन डरता हूँ कि पता नहीं आपको मेरी यह ख़ुशी भी अच्छी लगेगी या नहीं…!” आदम ने अपनी हथेलियां मलते हुए कहा।
“ ऐसा क्यों सोचते हो आदम ? मैं तुम्हारी माँ हूँ बेटा !” कहते हुए रोजीना रो पड़ी।
“ मम्मा प्लीज, रोइए तो नहीं, मैं बताऊंगा आपको। आज शाम ही चलेंगे मेरी ख़ुशी के पास ।” आदम ने उन्हें गले लगाते हुए कहा।
रात के नौ बज रहे थे। और उन तीनों को मैरी से मिलकर आए एक घंटा गुजर चुका था। होटल के कमरे में मुनीर साहब और उनकी बीवी मुट्ठियां भींचे टहल रहे थे। आदम सोफे पर सर झुकाए चुपचाप बैठा था।
“ आख़िर तुमने क्या सोचकर एक सफ़ाई वाली अंग्रेज की बेटी को मेरे सामने लाकर खड़ा किया मेरी बहू बनाने के लिए ? तुम्हें और कोई नहीं मिली थी ?” रोजीना गुस्से से फूंफकारती हुई बोली।
“ मम्मा, इस तरह तो न कहिए ! वह मेरी पहली और आख़िरी मोहब्बत है ।”
“ मोहब्बत माय फूट ! दोबारा फिर तुम उस लड़की से मिले भी तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा और उस लड़की के हश्र के ज़िम्मेदार तुम होगे। तुम मुझे अभी जानते नहीं हो आदम ! दुनिया से नामो-निशान मिटा सकती हूँ उसका, अगर ऐसा नहीं चाहते हो तो चलो चुपचाप वापस इंडिया। नहीं बनाना है मुझे तुम्हें डॉक्टर, वहीं चलकर इंजीनियरिंग कर लेना ।”
“ मम्मा.. मम्मा शांत हो जाइए, मैं यहीं रहकर पढ़ना चाहता हूँ। मैं बिल्कुल वैसा बन जाऊंगा मम्मा जैसा आप मुझे बनाना चाहती हैं। बस मेरी इस ख़्वाहिश को रद्द मत करिए। बचपन से लेकर आज तक आपने मुझे हर चीज़ दिया बस वो नहीं दिया जिससे मुझे ख़ुशी मिले.. प्लीज मम्मा, पापा.. कम से कम आप तो समझिए मुझे, मैं जी नहीं पाऊंगा पापा !” आदम किसी छोटे बच्चों के जैसे फफक पड़ा।
क्रमश: