जहाँ एक शिक्षक का दिया गया उधार, ज़िंदगी भर का फ़र्ज़ बन गया।
उत्तम कुमार तिवारी ” उत्तम “, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
एक गाँव था जिसका नाम उदयपुर था । उस गाँव मे लक्ष्मी नारायण नाम का एक व्यक्ति था । जो बहुत गरीब था । दिहाड़ी मजदूरी करके अपना जीवन यापन करता था । उसके कोई औलाद नही थी । बड़ी मन्नतो के बाद एक पुत्र ने जन्म लिया जिसका नाम लक्ष्मी नारायण ने कुलदीपक रखा था ।
छह महीने के पश्चात ही लक्ष्मीनारायण की बीमारी की वजह से मृत्यु हो गई । अब कुलदीपक के भरण पोषण की जिम्मेदारी उसकी माँ के ऊपर आ गई । गरीबी की वजह से कुलदीपक की माँ आसपास के घरों मे बर्तन माजने का काम करने लगी । जब वो घरों मे बर्तन माज़ने जाती थी तो वाह कुलदीपक को भी साथ मे ले जाती थी । धीरे धीरे कुलदीपक ४-५ वर्ष का हो गया था । और अपनी माँ के साथ पीछे पीछे जाने लगा था ।
वो जिस घर मे जाती थी उस घर के बच्चो की कोई भी किताब मिल जाती थी तो वह उनकी किताबे पढ़ने लगता था । इस वहज से उसकी पढ़ने मे रुचि बढ़ने लगी थी । उसकी रुचि को देख कर उसकी माँ ने उसका गाँव के प्राथमिक विद्यालय मे उसका दाखिला करवा दिया । अब वो मन लगा कर पढ़ने लगा । उसकी पढ़ाई की लगन को देख कर सभी शिक्षक उससे बहुत प्रसन्न रहते थे ।
इसके विद्यालय मे एक शिक्षिका थी जिनका नाम सरोज था । उनका स्वभाव बच्चों के प्रति बहुत अच्छा था । वो बिल्कुल माँ की तरह हर बच्चो का ध्यान रखती थी । जिससे सारे बच्चे बहुत प्रसन्न रहते थे । एक दिन सरोज ने बच्चो से कहा कि आज यदि मै तुम सबको सौ रुपये दूँ तो तुम लोग क्या करोगे तो किसी ने कहा कि हम खिलौने लेंगे तो किसी ने कहा कि हम चाट बतासे खाएंगे किसी ने कुछ कहा । लेकिन कुलदीपक चुपचाप बैठा रहा तब सरोज ने कुलदीपक से कहा कि तुम कुछ नही बोलते हो कि तुम क्या करोगे ?
तब कुलदीपक ने कहा कि मैम मै अपनी माँ के लिये चप्पल खरीदूँगा तो सरोज ने कहा कि चप्पल तुम क्यु खरीदोगे चप्पल तुम्हारे पिता जी खरीद कर देंगे तो कुलदीपक ने कहा कि मैम मेरे पिता जी का स्वर्गवास हो चुका है जब मै केवल छह माह का था । तब से मेरी माँ ही मेरा भरण पोषण करने के लिये घरों घरों बर्तन माजने का काम करती है और मेरी माँ के पास चप्पल नही है जिसकी वजह से वो नंगे पाँव जाती है जिसकी वजह से मेरी माँ के पैरो मे छाले पड़ गये है । मेरी माँ जब सब जगह से काम करके आती है तो वह अपने पैरो के छालो मे हल्दी और तेल लगाती है । ये देख कर मुझे बहुत दुख होता है ।
उसकी ये बात सुन कर सरोज को बहुत कष्ट हुआ । सरोज ने कुलदीपक को लिपटा लिया और कुलदीपक को दो सौ रुपये दिये और कहा कि सौ रुपये तुम्हारी माँ के चप्पल के लिये और सौ रुपये तुम्हारे लिये तो कुलदीपक ने सौ रुपये अतिरिक्त लेने से मना कर दिया और कहा कि जितने सब बच्चों को मिले है उतने ही हम भी लेंगे नही तो सब बच्चों को दुख होगा । ये बात सुनकर सरोज और भावुक हो गई । तब सरोज ने कहा कि ये सौ रुपये तुम्हे मै उधार दे रही हूँ । जब तुम कमाने लगना तब मुझे वापस कर देना ।
इस बात को कुलदीपक ने दिल से ले लिया ।
क्रमश: