“जब जिम्मेदारी पूरी होती है, तब किस्मत भी करवट बदलती है।”
विजय कुमार तैलंग, जयपुर (राजस्थान)
“… अगर मैं बता दूँ बापू? “
“तू क्या बताएगी बेटी। तू तो कहीं आती जाती भी नहीं। “
“आती जाती तो हूँ बापू, तेरे साथ ही! “
“वो तो ठेकेदार की नौकरी पर जाती है। “
“हाँ, वहीं बापू! ठेकेदार के बेटे रोहित ने मुझसे ब्याह करने की इच्छा जताई है! “
“वो तो इंजीनियर है, वो तेरे साथ क्यों शादी करेगा? ठेकेदार भी नहीं मानेगा। “
बापू की बात सुनकर सुरीली चुप हो गई।
दूसरे दिन ही जब दयाराम अस्पताल की निर्माण साइट पर बेटी सुरीली के साथ साईकिल पर पहुँचा तो ठेकेदार ने काम के बाद मिलने के लिए कहा। दयाराम के माथे की शिकन बढ़ गईं कि आखिर ठेकेदार ने उसे क्यों बुलाया है।
काम के बाद शाम को जाने से पूर्व जब सुरीली ठेकेदार के बेटे को स्टोर की चाबी देने गई उसी समय दूसरी दिशा में दयाराम ठेकेदार का मंतव्य जानकर अवाक हो गया। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ठेकेदार अपने बेटे रोहित के लिए उसकी बेटी सुरीली का हाथ मांग रहा था। वह कृतज्ञ हो उठा। उसे कुछ न सूझ रहा था। केवल उसकी आँखें भर आईं थी।
ठेकेदार ने बिना अधिक दिन गंवाये, अपने बेटे रोहित का विवाह दयाराम की बेटी सुरीली से, बड़े धूमधाम से कर दिया।
अब दयाराम अपने घर में अकेला ही रह गया था। वह अमावस की रात भी दूर नहीं थी जब उसके जीवन का अंतिम दिन था लेकिन दयाराम को अब कोई चिंता नहीं थी और वो आने वाली मौत का इंतजार कर रहा था।
उस अमावस की रात को वह सब काम से निवृत हो चुपचाप खटिया पर लेट गया ये सोचकर कि आज उसकी आखिरी रात है। मौत की प्रतीक्षा में लेटे लेटे उसे नींद आ गई!
जब दयाराम की आँखें खुलीं तो सवेरा हो चुका था, यानी वह मरा नहीं था। उसकी मौत टल गई थी। वह हैरान हो गया। क्या यह उसके दूसरे जीवन का सवेरा था?
सूरज की रौशनी दरवाजे से सीधी उसकी आँखों पर पड़ रही थी। दरवाजे पर दो साये खड़े थे। वह पहचानने के लिए खटिया पर से उठता हुआ बोला – “आप लोग कौन?”
दोनों साये उसकी खटिया के पास आकर खड़े हो गये।
उसने अपनी आँखें मलते हुये पहचाना तो उसकी बेटी सुरीली और दामाद रोहित खड़े मुस्कुरा रहे थे।
“बापू, हम तुम्हें लेने आये हैं, तुम्हारे पेट दर्द का इलाज अब शहर के अच्छे अस्पताल में होगा।” रोहित बोला।
उसने अपनी बेटी सुरीली को देखा तो वह ‘हाँ’ में सिर हिलाती हुई समर्थन कर रही थी।
(काल्पनिक रचना)