“जब जिम्मेदारी पूरी होती है, तब किस्मत भी करवट बदलती है।”
विजय कुमार तैलंग, जयपुर (राजस्थान)
…दयाराम फीकी हंसी हंसकर चुप हो जाता।
दयाराम अपने मकान के रेहन पर और कर्ज लेना चाहता था ताकि सुरीली की शादी कर सके। ऐसे में अपने इलाज पर वह कौड़ी भी खर्च नहीं करना चाहता था। वह सोचता था कि वैसे भी वह लम्बी जिंदगी का करेगा भी क्या? बेटी बिदा होते ही वह नितांत अकेला हो जायेगा, इससे तो अच्छा है कि वह बेटी की इस जिम्मेदारी से मुक्त होकर चैन से मर जाये। हालांकि जब तक वह बेटी को किसी अच्छे से घर में ब्याह नहीं देता तब तक के लिये वह जिंदा रहना चाहता था। उसने सुना था कि बगल के गाँव के बाहर एक चमत्कारी बाबा ने आकर धुनी रमाई है और वह बाबा रोगियों का उपचार भी कर देता है। दयाराम ने उसी बाबा से अपना इलाज करवाना उचित जाना और एक दिन सुरीली से काम से बाहर जाने की कहकर बगल के गाँव की ओर चला गया।
“क्यों भैया, बाबा इलाज का क्या लेगा? ” दयाराम ने बगल के गाँव के एक वाशिंदे से पूछा।
“देखने के बीस रुपये और इलाज बताये या दवा दे तो कुछ और भी।”
खैर, जी कड़ा करके दयाराम बाबा के स्थल पर पहुँच गया और अपनी पीड़ा बताई।
त्रिपुण्डधारी बाबा ने दयाराम को देखते ही बोला – “कितना लाये हो?”
“अभी सिर्फ सौ रुपये लाया हूँ महाराज।”
बाबा को दयाराम की स्थिति देखकर अंदाज हो गया था कि वह कुछ ज्यादा नहीं दे पायेगा इसलिए उसने दयाराम को देखकर बोला, “वत्स, तेरी उम्र केवल दो माह बकाया है। इसमें जो करना हो कर जा अन्यथा बाद में मौका नहीं मिलेगा। दूसरे माह अमावस्या की रात में तेरी मृत्यु निश्चित है। ये भभूत ले जा और रोज प्रात: काल इसकी एक चुटकी पानी के साथ निगल लेना। इससे तुझे पेट दर्द से राहत मिलेगी। ला, सौ रुपये दे!
क्रमश: