जब माँ का हक़ परिवार की ज़रूरतों में दब गया, तब न्याय माँगने माँ खुद अदालत पहुँच गईं।
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
आख़िरी सलाम
दिल्ली की सर्द सुबह थी।
कॉलोनी की हवा में नमी थी और उस नमी में एक घर का सन्नाटा जैसे किसी तूफ़ान के बाद की ख़ामोशी सुना रहा था।
सरकारी बंगला नंबर 12 — जिसके बाहर आज लोगों की भीड़ थी। अंदर से एक ही आवाज़ बार-बार सुनाई दे रही थी — “राम नाम सत्य है…”
आईएएस अधिकारी अशोक मेहता — जिन्हें लोग “ईमानदारी का प्रतीक” कहते थे — का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था।
पड़ोसी अधिकारी, स्थानीय विधायक, मीडिया, सब मौजूद थे।
पर उस भीड़ के बीच कोने में बैठी थीं — शारदा देवी, उनका चेहरा सफेद सा पड़ गया था।
वो चुप थीं, बस उनके हाथों में अपने पति की पुरानी घड़ी थी, जिसे वो बार-बार सहला रही थीं।
पड़ोसन मिसेज़ कपूर ने धीरे से पूछा,
“शारदा जी, कुछ खा लीजिए… सुबह से कुछ नहीं लिया आपने।”
शारदा ने फीकी मुस्कान दी —
“भूख? भूख तो तब लगती है जब कोई साथ हो जो पूछे — ‘खाया या नहीं?’”
उनके दोनों बेटे राहुल और सुमित तभी पहुंचे।
राहुल, बंगलोर से आया था — हाथ में मोबाइल, कान में ब्लूटूथ।
सुमित, मुंबई की बैंकिंग नौकरी से थका हुआ।
राहुल ने आते ही कहा,
“माँ, ये सब कैसे हो गया? आपने बताया क्यों नहीं कि पापा इतने बीमार थे?”
शारदा ने आँखें उठाईं,
“बताने को वक्त ही कहाँ मिला बेटा… वो भी तो यही कहते रहे — ‘डराना बंद करो शारदा, अभी बहुत काम बाकी हैं।’ और फिर एक दिन… काम भी खत्म, वक्त भी।”
सुमित ने माँ का हाथ थामा,
“अब हम हैं न माँ, आप अकेली नहीं हैं।”
उस वक़्त शारदा को लगा —
शायद अब उनके जीवन में फिर से सहारा होगा।
पर यह सहारा धीरे-धीरे सौदेबाज़ी में बदल जाएगा, यह उन्हें कहाँ पता था।
क्रमश: