“कभी-कभी एक छोटा-सा ऑर्डर भी इंसानियत का सबसे बड़ा स्वाद दे जाता है।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
शाम के पाँच बज रहे थे। स्कूल से लौटकर आरव अपने कमरे में बैठा था। आज उसका मन थोड़ा उदास था। सुबह दोस्तों ने पिज़्ज़ा पार्टी की बात की थी और सबने मज़े किए थे… लेकिन वह पैसे न होने के कारण हिस्सा नहीं बन सका। माँ-पापा खर्चों को लेकर हमेशा थोड़ा सख़्त रहते थे, इसलिए उसने चुपचाप मुस्कुरा कर बात टाल दी।
कमरे में बैठे-बैठे, भूख और उदासी दोनों मिलकर उसे परेशान करने लगीं। वह बार-बार दीवार घड़ी देख रहा था—जैसे कोई खास पल इंतज़ार में खड़ा हो। अचानक उसके मन में एक ख्याल आया।
“क्यों न आज पिज़्ज़ा खा ही लिया जाए? कार्ड से पेमेंट कर दूँगा… बाद में पापा को बता दूँगा।”
यह सोचकर उसने मोबाइल उठाया और बिना ज़्यादा सोचे पिज़्ज़ा ऑर्डर कर दिया।
घर का वातावरण
नीचे ड्राइंग रूम में उसके पापा राजेश अख़बार पढ़ रहे थे। नौकरी का तनाव, बढ़ते खर्चे, और घर की ज़िम्मेदारियाँ… उनकी माथे की लकीरों में साफ़ दिख रही थीं। पत्नी प्रिया किचन में चाय बना रही थीं।
तभी मोबाइल पर एक नोटिफ़िकेशन आया—
“Your pizza is on the way!”
राजेश ने नोटिफिकेशन देखा और भौंचक्के रह गए।
“ये क्या! पिज़्ज़ा? किसने मंगवाया?”
उन्होंने थोड़ी ऊँची आवाज़ में पूछा।
आरव नीचे आ चुका था। उसने हिचकिचाते हुए कहा—
“मैंने… पापा।”
राजेश के चेहरे पर नाराज़गी साफ दिखने लगी।
“आरव! मैंने कितनी बार कहा है पैसे यूँ फ़ालतू मत उड़ाया करो। इतनी महँगाई में पिज़्ज़ा कोई रोज़ खाने की चीज़ है? घर में खाना है, फिर ये सब क्यों?”
आरव चुप रहा, आँखें झुकी हुईं।
उसे लगा, शायद उसने सच में ग़लती कर दी।
माँ ने माहौल संभालने की कोशिश की।
“अरे, कभी-कभी बच्चा खा लेगा तो क्या बुरा है? शायद दोस्तों ने बात की हो…”
लेकिन राजेश का मूड खराब था।
“नहीं प्रिया, आदतें यहीं से बिगड़ती हैं।”
आरव अंदर से टूट चुका था। वह सोच रहा था—
काश… पापा मेरी बात समझ पाते।
डोरबेल और एक अप्रत्याशित दृश्य
तभी डोरबेल बजी।
राजेश भुनभुनाते हुए दरवाज़ा खोलने गए।
“लो, आ गया तुम्हारा पिज़्ज़ा… अब—”
लेकिन दरवाज़ा खुलते ही उनकी आवाज़ थम गई।
दरवाज़े पर एक दुबला-पतला लड़का खड़ा था। लगभग 20–21 साल की उम्र… कंपनी की लाल जैकेट पहने। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, लेकिन उस मुस्कान के पीछे छुपी थकान सीधे दिल को छू रही थी।
और सबसे ध्यान देने वाली बात—
उसकी एक बाँह कोहनी से नीचे तक नहीं थी।
वो सिर्फ एक हाथ से बैग पकड़े खड़ा था।
राजेश का गुस्सा एक पल में कहीं गायब हो गया।
डिलीवरी बॉय बोला,
“सर… आपका ऑर्डर।”
उसकी आवाज़ में विनम्रता थी। उसने बैग को घुटने से टिकाकर, अपने एक ही हाथ से धीरे-धीरे पिज़्ज़ा निकालकर थमाया।
राजेश की आँखें भर आईं—बिना किसी के देखे।
उन्होंने हौले से पूछा,
“बेटा… तुम ये काम कैसे कर लेते हो? मुश्किल नहीं होती? सबसे आश्चर्य की बात है कि तुमने 10 मिनट से भी कम समय में हमारे लिए डिलीवरी कर दी! शहर के भारी ट्रैफिक के बीच इस काम को अंजाम दिया!! तुम्हारी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी!!!”
क्रमश: