“रामभावना से विश्वशांति तक — भारत की नई दिशा, मानवता का नया उजास।”
-श्यामकांत देशपांडे, नागपुर
…इसी सनातन मूलधारा को पुनर्स्थापित करने का प्रथम चरण था 22 जनवरी 2024 को अयोध्या राममंदिर में सम्पन्न हुई प्रभु श्रीराम की प्राण-प्रतिष्ठा।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम संपूर्ण विश्व के आराध्य हैं। आज पाँचों महाद्वीपों में शायद ही कोई देश हो जहाँ राममंदिर न हो—और यदि न भी हो, तो हिन्दू परिवारों के घरों में अवश्य एक छोटा-सा मंदिर होता है जहाँ रामनाम की उपस्थिति सर्वत्र रहती है।
इसी कृपा से विश्वभर में हिन्दू समुदाय को शांतिप्रिय, विद्वान और संगठित नागरिक के रूप में सम्मान प्राप्त है।
अनेक देश इसके प्रमाण हैं—स्वामी प्रणवानन्द द्वारा स्थापित विदेशों के हिन्दू मिलन मंदिर, स्वामीनारायण मंदिर, और वेदान्त सोसाइटी के आश्रम सभी रामभक्तों के सेवाधाम हैं।
भारत में लगभग 20 लाख राममंदिर हैं, जबकि अकेले अमरीका में लगभग 1500 राममंदिर स्थापित हैं। न्यू जर्सी के रॉबिन्सविल स्थित विशाल मंदिर का क्षेत्रफल 185 एकड़ है, जहाँ एक साथ हजारों वाहनों की पार्किंग संभव है।
संत रविदास मंदिर (विएन्ना), निम्बार्क स्मृति मंदिर (स्कॉटलैंड), लक्ष्मी नारायण मंदिर (कैलिफ़ोर्निया), ब्राम्पटन मंदिर (कनाडा), सूरीनाम, म्यांमार, मॉरिशस, नेपाल, थाईलैंड और श्रीलंका—इन सभी देशों में रामभक्ति का विस्तार है।
अबूधाबी के अलबक़्वा स्थित मंदिर ने भी विश्व में विशिष्ट पहचान बनाई है।
अयोध्या का राममंदिर मध्यप्रदेश के ओरछा स्थित रामराजा मंदिर से सांस्कृतिक रूप से जुड़ा है, जहाँ आज भी श्रीराम को राजा मानकर प्रतिदिन प्रातः और सायं गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है।
रामराज्य का विस्तार इतना व्यापक है कि दुनिया का कोई भी कोना रामभावना से अछूता नहीं—तंजानिया, फिज़ी, कम्बोडिया का ओंकार मंदिर, बाली का बेसाकी मंदिर, अफगानिस्तान, पोलैंड, सूरीनाम, गुयाना, पाकिस्तान के लाहौर-मुल्तान-सिंध क्षेत्र के मंदिर इसके उदाहरण हैं।
दक्षिण अमेरिका के घने जंगलों में स्थित होंडुरास के क्षेत्र में पाए गए प्राचीन अवशेष—जिन्हें किंगडम ऑफ द मंकी गॉड कहा जाता है—अत्यंत प्राचीन सभ्यता के निर्देशक हैं।
वहाँ महल, मूर्तियाँ, तालाब और राजसी संरचनाएँ आज भी विद्यमान हैं।
क्रमश: